यह जड़ जगत सांसारिक सुख पाने के लिए नहीं है अपितु अपने विवेक का उपयोग करने के लिए है!

यह जड़ जगत सांसारिक सुख पाने के लिए नहीं है अपितु अपने विवेक का उपयोग करने के लिए है!

जैसा की हम सब जानते हैं कि कलयुग का प्रभाव दिन पर दिन बढ़ रहा है और इस बढ़ते हुए कलयुग में छल, कपट, कलह और पाखण्ड भी बढ़ रहा है| इस बढ़ते हुए छल कपट के कारण हम देख सकते हैं कि जीवन के हर क्षेत्र में और हर रिश्ते में संघर्ष है और कलह है| फिर चाहें यह मत भेद और झगड़ा शिक्षा सम्बन्धी संस्थाओं में शिक्षकों और छात्रों के बीच हो, या फिर अध्यात्मिक संस्थाओं में गुरु और शिष्य के बीच हो, घर में माता पिता और उनके बच्चों में हो, या फिर पति पत्नी के बीच हो, कलह और अशांति हर जगह है| बहुत से लोग इस बढ़ते हुए कलयुग के प्रभाव से बैचेन और परेशान हैं| आज के समाज में सत्यता का होना बहुत ही दुर्लभ है|

धर्म के चार स्तम्भ हैं| तप (ध्यान), सोछ (स्वच्छता), दया (करुणा) और सत्य (सत्यता)| इसी प्रकार से चार युग भी हैं – सतयुग, त्रेता युग, द्वापर युग और कलयुग| हमारे शास्त्रों और वेदों के अनुसार हर युग में अध्यात्मिक जीवन की उन्नति के लिए अलग अलग विधि है| सतयुग में अध्यात्मिक जीवन में प्रगति करने की विधि ध्यान यानि की तप को बताया गया है| त्रेता युग में बताया गया है कि सोछ यानि कि स्वच्छता से अध्यात्मिक जीवन में विकास होता है और द्वापर युग में दया को अध्यात्मिकता में उन्नति के लिए श्रेष्ठ बताया गया है| कलयुग में सत्यता का पालन करने से ही अध्यात्मिक जीवन में प्रगति संभव है|

इस समय कलयुग चल रहा है| कलयुग का आरम्भ तब हुआ जब द्वापर युग के अंत में परम भगवान् श्री कृष्ण ने शारीरिक रूप से इस पृथ्वी को छोड़ दिया और अपने नित्य धाम में प्रवेश किया| उसी समय कलयुग साक्षात रूप लेकर महाराज परीक्षित के सामने प्रगट हुआ| परीक्षित महाराज अभिमन्यु के पुत्र थे और अर्जुन और सुभद्रा देवी के सुपुत्र थे| अर्जुन पांच पांडवों में से एक थे और उत्तम धनुर्धर होने के साथ साथ भगवान् कृष्ण के परम मित्र भी थे और सुभद्रा देवी भगवान् कृष्ण की छोटी बहन थीं|

परीक्षित महाराज पूरी पृथ्वी के राजा थे| वे एक धर्मपरायण राजा होने के साथ साथ बहुत पराक्रमी भी थे| उन्हें कभी भी युद्ध में कोई पराजित नहीं कर सकता था| एक दिन परीक्षित महाराज ने अपने राज्य में एक बहुत ही अधर्म और पाप का कार्य होते हुए देखा| उन्होंने देखा कि एक व्यक्ति राजा की वेश भूषा में सुसज्जित होकर एक गाय को पैरों पर मार रहा है| उस गाय के पास एक बैल अपने एक पैर पर खड़ा था और उसके बाकी के पैर टूटे हुए थे|

ऐसे घृणित कार्य को देखकर परीक्षित महाराज को बहुत क्रोध आया और उन्होंने उस घोर अपराधी को दंड देने के लिए तुरंत ही अपना तीर धनुष निकाल लिया| वह व्यक्ति और कोई नहीं बल्कि स्वयं कलियुग था जिसका स्वभाव ही है छल, कपट और कलह|

परीक्षित महाराज को वहां देखकर कलि ने तुरंत ही अपने आपको उनके चरणों में गिरा दिया और उनसे विनम्र भाव से विनती करने लगा, “महाराज मैं आपकी शरण में हूँ| कृपया मेरा वध मत कीजिये|” परीक्षित महाराज एक धर्मपरायण राजा थे और वे जानते थे कि जिस व्यक्ति ने राजा की शरण ली हो उसको हानि पहुँचाना धर्म के विरुद्ध है| ऐसा सोचकर महाराज ने अपना तीर धनुष रख दिया और ऊँचे स्वर में कलि को आदेश दिया,”मेरे राज्य को छोड़ कर चले जाओ|” कलि ने कहा, “महाराज मैं कहाँ जाऊं? आप तो इस पूरी पृथ्वी के राजा हैं जहाँ भी मैं जाऊँगा वह आपका ही राज्य होगा| मैं आपकी शरण में हूँ और आपके राज्य का नागरिक हूँ| कृपया मुझे रहने के लिए स्थान दें|”

अपने दयालु स्वभाव के कारण परीक्षित महाराज ने कलि को रहने के लिए चार स्थान दिए| यह चार स्थान वह हैं जहाँ केवल अधर्म का कार्य होता है जैसे कि जुआ खेलना, मदिरा पान करना, किसी स्त्री या पुरुष के साथ अवेध सम्बन्ध रखना और हिंसक कार्य करना| इसके उपरांत परीक्षित महाराज ने कलि को रहने के लिए क पांचवा स्थान भी दिया– यह स्थान था सोने का एक टुकड़ा यानि कि सुवर्ण| अगर आप ध्यान से सोचें तो आप यह देख सकते हैं कि इन पांच स्थानों में ही सबसे ज़्यादा छल, कपट और कलह होते हैं|

परीक्षित महाराज के कलि के साथ इस संवाद के उपरांत जब वह जंगले में आगे बढ़े तो उनको बहुत प्यास लगी| यह ऐसा समय था जब भगवान् यह चाहते थे कि परीक्षित महाराज को इस भौतिक जगत से वापस बुला लिया जाए| इस कार्य को पूरा करने के लिए भगवान् ने अपनी महा माया शक्ति को एक मरे हुए सर्प के रूप में भेजा| परीक्षित महाराज व्याकुल होकर पानी की तलाश करने लगे और एक आश्रम में पहुंचे| आश्रम में प्रवेश करके उन्होंने देखा कि एक ऋषि गहरे ध्यान में हैं| उन्होंने ऊँचे स्वर में ऋषि से पानी माँगा| परन्तु गहरे ध्यान में होने के कारण ऋषि ने महाराज की बात नहीं सुनी| भगवान् की ऐसी इच्छा थी कि ऐसे समय में महाराज परीक्षित को क्रोध आ जाए|

उसी समय परीक्षित महाराज ने देखा कि आश्रम में एक मरा हुआ सर्प (मायादेवी) पड़ा हुआ है और क्रोध की अवस्था में उन्होंने उस मरे हुए सर्प को उठाकर ऋषि के गले में डाल दिया| उस ऋषि का नाम शैमिक मुनि था| जब शैमिक मुनि के पुत्र श्रृंगी को इस घटना के बारे में पता चला तो उन्होंने परीक्षित महाराज को श्राप दे दिया| श्राप के अनुसार सात दिन पश्चात तक्षक नाम के सर्प के काटने पर परीक्षित महाराज की मृत्यु हो जायेगी| और इस श्राप के अनुसार परीक्षित महाराज ने सात दिन पश्चात इस संसार को छोड़ दिया|

इसके पश्चात यह पूरी पृथ्वी कलि के प्रभाव से ग्रसित हो गयी| जिसके फलस्वरूप हम देख सकते हैं कि जीवन के हर क्षेत्र में लोग केवल बाहर से दयालु होने का दिखावा करते हैं| अन्दर से लोग बहुत स्वार्थी हो गए हैं और केवल अपने लाभ के लिए ही हर कार्य करते हैं| और जहाँ पर स्वार्थ होगा वहां पर छल, कपट और कलह तो निश्चित ही होंगे|

इस कलयुग के साथ साथ छल, कपट और कलह भी बढ़ते जा रहे हैं और इसके साथ साथ ही लोगों की बैचेनी भी बढ़ती जा रही है| इस प्रकार हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि इस जड़ जगत में सांसारिक सुख तलाशने का कोई लाभ नहीं है| हम सब को अपने जीवन में विनम्र स्वभाव और सहनशीलता अपनानी चाहिए और प्रयास करना चाहिए कि हम सबको सम्मान देते हुए झूठी प्रतिष्ठा से दूर रहें| अगर हम ऐसे गुणों को अपनाएंगे तो हम कलि महाराज के प्रभाव से दूर रहेंगे| इसके लिए हमें एक सदगुरु की, जो कि एक प्रमाणित परंपरा से हों, शरण लेनी होगी और हरे कृष्ण महामंत्र का जप करना होगा|

हमारी परंपरा का नाम है ‘ब्रह्म सम्प्रदाए’| हमारे संप्रदाय के अनुसार श्री कृष्ण ही परम भगवान् हैं और इस ब्रह्माण्ड के सर्वोच्च गुरु हैं| इस कलयुग में 531 वर्ष पहले, श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु के रूप में, श्री कृष्ण इस धरती पर प्रगट हुए| उनका लक्ष्य था हमको कलयुग के प्रभाव से बाहर निकालना| श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु ने शुद्ध भक्तों के अनुयायी होकर हरे कृष्ण महामंत्र का जप करने की शिक्षा हमें दी|

आज गौरचतुर्थी है| तीन दिन में दुर्गा पूजा का उत्सव आरम्भ होने जा रहा है जो की हिन्दुओं के लिए एक महत्वपूर्ण उत्सव है| दुर्गा देवी श्रीमती राधा रानी का ही विस्तार रूप हैं|

श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु के कार्य की प्रगति के लिए, मेरे गुरुदेव श्रील भक्ति प्रमोद पुरी गोस्वामी ठाकुर, बुधवार,18 October 1898 को (कार्तिक महीने के दूसरे दिन पर), प्रगट हुए| वे सुबह ब्रह्म मुहुर्त में, जेसोर ज़िले के गंगानन्दपुर गाँव में, (जो कि अब बांग्लादेश में है), प्रगट हुए|

मेरे गुरुदेव हमेशा कहते थे, “यह जड़ जगत सांसारिक सुख पाने के लिए नहीं है| सांसारिक सुखों के पीछे भागने की बजाय हमें पूरे विवेक के साथ यह सोचना चाहिए कि कैसे हम सुअवसर का लाभ उठाकर इस दुःख भरे संसार से अपने आपको मुक्त करा सकते हैं|”

कलि महाराज के प्रकोप से हम सब व्यथित हैं| कलि के इस प्रभाव से बचने के लिए यह आवश्यक है कि हम उन पाँचों स्थानों का त्याग करें जहाँ पर कलि महाराज वास करते हैं और इसके साथ ही हम किसी शुद्ध भक्त के अनुयायी होकर हरे कृष्ण महामंत्र का जप करें|

जब हम इन नियमों का पालन करते हुए हरे कृष्ण महामंत्र का जप अपने पूरे हृदय से करेंगे, तो निश्चित ही धीरे धीरे हममें अलौकिक गुण प्रगट होने लगेंगे| यह अलौकिक गुण हैं विनम्रता, सहनशीलता, झूठी प्रतिष्ठा से मुक्ति और सभी जीवों को सम्मान करने की भावना|

हमें यह पता होना चाहिए कि विनम्रता एक वैष्णव का आभूषण है| विभिन्न शास्त्रों का ज्ञान हमें इस दुखभरे जगत से मुक्ति नहीं दिला सकता| परन्तु एक शुद्ध भक्त के अनुयायी होकर, हरे कृष्ण महामंत्र का जप करने से धीरे धीरे हम कलयुग के प्रभाव से निकलकर, भगवान् के नित्य धाम, गौलोक वृन्दावन में प्रवेश कर पायेंगे, जहाँ हमें नित्य आनंद का अनुभव होगा|

आज मेरे गुरुदेव की 119 वीं व्यास पूजा के इस पावन उपलक्ष्य पर, मैं आप सबसे विनम्र निवेदन करता हूँ कि आप लोग मुझे आशीर्वाद दें जिससे मुझमें वह सहनशीलता आ सके कि मैं श्रीमान महाप्रभु के भक्तों के बीच मतभेद के साथ सामंजस्य कर सकूँ और साथ ही इस संसार के लोगों के बीच जो मतभेद हैं उनके साथ भी सामंजस्य कर सकूँ|

शास्त्रों के अनुसार हम सब यह जानते हैं कि श्री गुरु भगवान् की कृपा के मूर्तिमान स्वरुप होते हैं और कृष्ण की कृपा से असंभव भी संभव हो सकता है| इसलिए आप सबसे प्रार्थना है की मुझ पर कृपा करें जिससे मैं भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु के आन्दोलन का सच्चा दास बन सकूँ और गोपियों के भी दासों का दास जनम जनम तक बन सकूँ|

आपका अयोग्य सेवक,
बी.बी. बोधायन