स्नान यात्रा

आज की तिथि बहुत शुभ है, आज ज्येष्ठ महीने की पूर्णिमा तिथि है, शास्त्र में ऐसा लिखा हुआ है कि इस पूर्णिमा तिथि को अवलम्बन करके बलदेव, सुभद्रा, जगन्नाथ इस संसार में प्रकट हुए। स्वयंभू मनु, जो १४ मनु में से प्रथम मनु है, उनके तप के प्रभाव से, उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर जगन्नाथ देव आज की तिथि में इस संसार में प्रकट हुए। इसलिए जगन्नाथ देव ने इंद्रधुम्न महाराज को आज की तिथि में बलदेव, सुभद्रा, जगन्नाथ की स्नान यात्रा करने के लिए आदेश दिया। इंद्रधुम्न महाराज अवन्ति नगर, मालव देश के राजा थे, वे परम भक्त थे। भक्त के लिए ही भगवान का आविर्भाव होता है कितने भक्त आए पर जगन्नाथ दारू ब्रह्म से प्रकट नहीं हुए। इंद्रधुम्न महाराज जब मालव देश के अवन्ति नगर में विराजमान थे, उनकी भाषा में ‘देवतला’ अर्थात् मंदिर निर्माण ग्रन्थ (Temple construction book) में इस विषय में विस्तृत रूप से वर्णन किया गया है। यहाँ विस्तार से नहीं पढूंगा क्योंकि यह बहुत लम्बा प्रसंग है।

इंद्रधुम्न महाराज ब्रह्मा के द्विपराध के, अभी जो कलियुग है उसकी आयु ४,३२,००० वर्ष है उससे दुगनी द्वापर, तीन गुनी त्रेता और चार गुनी सतयुग की आयु है। सत, त्रेता, द्वापर और कलियुग की आयु मिलाकर ४३, २०, ००० वर्ष होते है। ऐसे चतुर्युग जब 71 बार बीत जाते हैं। तब एक मनु की आयु पूरी होती है। ब्रह्मा के एक दिन में 14 मनु की आयु शेष हो जाती है और इसी प्रकार ब्रह्मा की एक रात में 14 मनु की आयु शेष हो जाती है। आप उसे calculate नहीं कर सकते हैं, इस प्रकार के 365 दिन ब्रह्मा का एक वर्ष होता है। इस प्रकार के 100 वर्ष की ब्रह्मा की आयु है, क्या हम लोग सोच भी सकते है? इस समय 28 चतुर्युग का सातवा मन्वन्तर चल रहा है। इस प्रकार एक पराध हुआ, ब्रह्मा की आयु का आधा समय।

 

प्रथम पराध में नील माधव भगवान शंख क्षेत्र में प्रकट हुए, पतित जीवो का उद्धार करने के लिए। और द्वितीय पराध में इंद्रधुम्न महाराज इस संसार में प्रकट हुए। वे बहुत बड़े भगवत भक्त थे। भक्त के लिए ही भगवान का आविर्भाव होता है।

 

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥

(गीता ४/७-८)

 

जब-जब धर्म की हानि होती है,अधर्म का प्रादुर्भाव होता है, तब-तब असुरो का संहार करने के लिए, साधुओ की रक्षा करने के लिए भगवान का आविर्भाव होता है। इस प्रकार गीता में लिखा हुआ है। किन्तु हमारे गुरूजी नित्यलीला प्रविष्ट विष्णुपाद 108 श्री भक्ति दयितमाधव गोस्वामी महाराज जी) ने व्याख्या की, असुर निधन करने के लिए और धर्म की स्थापना करने के लिए भगवान के आविर्भाव की कोई आवश्यकता नहीं है। भगवान तो सर्वशक्तिमान है, भगवान की इच्छा से ही अनंत ब्रह्माण्ड एक मुहूर्त में ही नाश हो जाते है और अनंत ब्रह्माण्ड की एक मुहूर्त में सृष्टि हो जाती है। उनको असुरों को मारने के लिए और धर्म की स्थापना करने के लिए आने की कोई आवश्यकता नहीं है।

 

किन्तु साधु किसको कहते हैं? साधु सब में भगवान और सब कुछ भगवान का देखते हैं, उन्हें सांसारिक आकर्षण नहीं होता है। वे सब भगवान और भगवान का, विष्णु और वैष्णव का देखते हैं। सभी वैष्णव है और विष्णु से हैं कोई इसे जानता है तो कोई नहीं जानता। विष्णु से जो है वह वैष्णव है और सब जीव उनकी शक्ति से ही आए हैं। किन्तु जब हम भगवान को भूल जाते है, संसार में आकर भेदभाव देखने लगते हैं। परन्तु भक्त देखते हैं कि सब भगवान और भगवान का है। वे किसी को अपने शत्रु के रूप में नहीं देखते हैं। शत्रु मेरा मन है, संसार में मेरा कोई और शत्रु नहीं है। सब अपने कर्मफल का भोग करते हैं किसी निमित द्वारा, किन्तु कारण वह नहीं है। इसलिए भक्त सब समय शांत रहता है जैसे, अम्बरीश महाराज शांत थे, प्रल्हाद महाराज सदैव शांत रहते थे, चाहे जितने प्रकार के अत्याचार उनके ऊपर किए गए। भक्त सब समय देखता है कि सब भगवान का है, भगवान से है, भगवान के द्वारा है, भगवान के लिए है। मंगलमय भगवान की इच्छा से जो होता है, मंगल के लिए होता है। इसलिए साधु का कोई शत्रु भाव ले कर दर्शन नहीं है। किन्तु जो बद्धजीव है, उसका मिथ्या अभिमान है इसलिए वह एक को मित्र और दुसरे को शत्रु के रूप में देखता है।

 

जब इंद्रधुम्न महाराज की भगवान के दर्शन करने की इच्छा हुई तो भगवान ने एक भक्त को इंद्रधुम्न महाराज के पास भेज दिया। भक्त ने उनको बताया कि भगवान नील माधव रूप में प्रकट हो चुके हैं, आप जब उनको ढूढेंगे तो उनकी कृपा से आपको उनका दर्शन हो जायेगा। तब उन्होंने अपने सब दूतों को नीलमाधव की खोज में भेज दिया। उसमें से विद्यापति भी एक थे। सब दूत वापस आ गए, किसी को कोई खबर नहीं मिली परन्तु विद्यापति वापस नहीं आये।

 

विद्यापति शबर देश में गए, वहाँ के प्रधान विश्वावसु थे, विद्यापति उनसे मिले। विश्वावसु ने जब देखा कि ब्राह्मण आये है तो उन्होंने अपनी कन्या ललिता से कहा कि तुम इनकी देखभाल करो। मैं अभी पूजा करने जा रहा हूँ। जब विश्वावसु पूजा करके वापस आये तो उनके शरीर से अप्राकृत जगत की, पवित्र चन्दन की सुगंध आ रही थी। तब विद्यापति ने सोचा कि जिन नील माधव की खोज में मै आया हूँ, हो सकता है कि यहाँ पर उनके बारे कुछ पता चले। उन्होंने ललिता से पूछा कि तुम्हारे पिताजी कहाँ जाते हैं तो उसने कहा कि पिताजी ने कुछ भी बताने से मना किया है। तब उन्होंने विश्वावसु से पूछा,”आप कहाँ, कौन से मंदिर में जाते हैं? किन्तु उन्होंने कुछ नहीं बताया। विद्यापति को कुछ संदेह हुआ, क्योंकि वे भक्त हैं, भक्त अप्राकृत विषय को अनुभव कर सकते हैं, अभक्त नहीं कर सकते हैं। भक्त के अंदर में भक्ति का प्रकाश होता है, उनको कुछ आलौकिक बात लगी इसलिए वे वही रुक गए। विद्यापति की सेवा करते-करते ललिता को उनसे प्रेम हो गया। और उसकी उनसे शादी करने की इच्छा हुई। उसने अपने पिता से इस बारे में बोला, तो विश्वावसु बोले कि हम दूसरी जाति के हैं, उसके साथ तुम्हारी शादी नहीं हो सकती है कभी गलती से भी उससे शादी की बात न बोलना।

 

किन्तु ललिता उनकी एक ही कन्या है और सब समय रोती रहती है। पिता का कन्या के प्रति स्नेह होने के कारण उन्होंने कहा कि विद्यापति मान जायेगे तो मैं शादी कर दूँगा। हम लोग नहीं बोल सकते, विद्यापति की अपनी इच्छा है। तब ललिता ने विद्यापति के आगे विवाह का प्रस्ताव रखा। विद्यापति ने सोचा कि अभी तो ये कुछ नहीं बता रही परन्तु जब विवाह हो जाएगा तो ये मेरी स्त्री हो जाएगी और सनातन धर्म में स्त्री कोई बात सद्पति से छिपा नहीं सकती है, तब मैं इससे पूछुंगा। मेरे कार्य की सिद्ध के लिए मुझे यह विवाह कर लेना चाहिए। उन्होंने ललिता से विवाह कर लिया और थोड़े दिन बाद ललिता से पूछा कि तुम्हारे पिताजी प्रतिदिन कहाँ जाते हैं? उसने बताने से मना किया तो विद्यापति बोले तुमने मुझसे विवाह क्यों किया, पति से कोई बात छिपानी नहीं चाहिए, सती स्त्री कोई भी बात अपने पति से छिपाती नहीं है, तुम्हे अपना हृदय खोलना पड़ेगा, वास्तव में तुमने मुझसे विवाह नहीं किया तुम्हारा अधर्म होगा और इस प्रकार उन्होंने उसको डराया।

 

तब उसने बताया कि मेरे पिता नीलमाधव के दर्शन करने जाते हैं। विद्यापति ने कहा कि मैं नीलमाधव के दर्शन करना चाहता हूँ। उसने अपने पिता को बताया कि उसके पति नीलमाधव के दर्शन करना चाहते हैं। यह सुनकर विश्वावसु नाराज होकर बोले कि तुमने उसे क्यों बताया मैंने किसी को भी बताने से मना किया था। जब वह रोने लगी तो उसके पिता का हृदय पिघल गया। उसके पिता बोले मैं उसे नीलमाधव के दर्शन के लिए ले जाऊंगा पर एक शर्त है कि मैं उसे आँख बंद कराके ले जाऊंगा और आँख बंद कराके वापस लाऊंगा। तब ललिता ने अपने पति से कहा कि आप अपने साथ सरसो के दाने ले जाना और रास्ते में फेंकते जाना, तब थोड़े दिनों में ही उसमें से पेड़ निकल आयेंगे और आपको मंदिर का रास्ता पता चल जायेगा।

 

विश्वावसु विद्यापति को सीधे रास्तें से न ले जाकर टेढे-मेढे रास्तो से ले गए। वहाँ पहुँच कर विश्वावसु ने मंदिर खोल दिया। नीलमाधव के दर्शन कर विद्यापति रोने लगे। प्रेम नेत्रों से भगवान के दर्शन होते हैं, हम कितनी बार पुरी, चाकदह जगन्नाथ के दर्शन के लिए जाते हैं पर हमें कुछ अनुभव नहीं होता। उनको अनुभव हुआ क्योंकि उन्हें पहले से जगन्नाथ के दर्शन करने की तीव्र इच्छा थी, उनकी आँखों में आँसू आ गए। भक्ति ही भगवान को वशीभूत करती है। विश्वावसु ने विद्यापति से कहा कि तुम यहाँ बैठो मैं वन से फल और फूल ले कर आता हूँ।

 

तभी विद्यापति ने देखा कि वहाँ पर एक कुंड है और पास में ही पेड़ पर एक कौआ बैठा था जो नींद में था और अचानक वह उस कुंड में गिर गया। उन्होंने देखा कि कौआ चतुर्भुज होकर चला गया। तब विद्यापति ने सोचा कि मुझे यह मौका नहीं छोड़ना चाहिए, मैं भी इसी तरह अपना शरीर छोड़ देता हूँ। परन्तु उसी समय देववाणी हुई कि महाराज को नीलमाधव की सुचना दो, उन्होंने तुम पर विश्वास किया है, वे एक भक्त हैं, तुम्हारा भक्त के चरणों में अपराध होगा, नीलमाधव कहाँ हैं— महाराज को ये संवाद देना।

 

वहाँ से विश्वावसु उन्हें आँख बंद कराके ले आये और उन्हें घर में बंद कर दिया। विद्यापति को बंद करने के कारण ललिता रोने लगी तो विश्वावसु ने सोचा, इसको छोड़ देता हूँ जो भी मेरे भाग्य में होगा देखा जायेगा।

 

विश्वासु ने जब नीलमाधव को भोग दिया था तब नीलमाधव ने कहा कि तुम्हारे वन के फल अब मुझे अच्छे नहीं लगते, अब मैं महाराज का दिया हुआ भोग खाऊँगा। इसलिए विश्वावसु डर गए कि भगवान जाने कीबात कर रहे हैं और भोग खाने को मना कर रहे हैं। इसलिए उन्होंने विद्यापति को जाकर कमरे में बंद कर दिया। जब उनकी कन्या रोने लगी तो उन्होंने सोचा कि मेरे भाग्य में जो होगा देखा जाएगा और उन्होंने विद्यापति को छोड़ दिया।

 

जब उनका कार्य सिद्ध हो गया, तो विद्यापति तुरंत महाराज इन्द्रदुम्न के पास वापस चले गए। भगवान नीलमाधव के बारे में जानकर राजा को बहुत आनंद हुआ। तब तक सरसों के दाने अंकुरित हो गए, वे नीलमाधव मंदिर तक सहजता से पहुंच गए। सेना ने पूरे क्षेत्र को घेर लिया। किन्तु जब उन्होंने मंदिर के दरवाजे खोले तो उन्होंने देखा, भगवान नीलमाधव वहाँ नहीं हैं। भगवान मंदिर में नहीं है, अंतर्ध्यान हो गए यह देखकर राजा बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़े और रोने लगे। और उस समय प्रभु ने उससे कहा, “मत रो, मैं दारुब्रह्म रूप से प्रकट होऊंगा।” वे अधोक्षज हैं (जो प्राक्रत इंद्रियों से नहीं जाना जा सकता )। वे मन और बुद्धि से परे हैं। यह बहुत लंबा विषय है, मैं जल्द ही बोलूंगा। जब प्रभु ने उसे इस तरह बताया, तो वे दारुब्रह्म के रूप में आए। तीन दारुब्रह्म आए। इन पर शंख, चक्र, गदा और पद्म के चिह्न हैं। वे सागर में तैरते हुए तटपर पहुंच गए। राजा को सपने में निर्देश हुआ कि वे दारुब्रह्म रूप में आ गए, उन्हें वहाँ से लाने के लिए एक रथ तैयार किया गया।किन्तु दारुब्रह्म इतने भारी थे कि सेना उन्हें उठा नहीं पा रही थी। हाथी को ले आए, हाथी भी उन्हें उठा न सके। तब राजा ने भगवान जगन्नाथ का आश्रय लिया , और भगवान जगन्नाथ ने उन्हें विश्वावसु को लाने को कहा। एक तरफ विद्यापति और एक तरफ विश्वावसु उन्हें पकड़ेंगे तो दारुब्रह्म बाहर आ जाएगे। वे दोनों आए और दारुब्रह्म को उठा लिया और वे सहजता से बाहर आ गए।

 

एक बार जब रथयात्रा उत्सव था, तब हम पुरी में श्रील गुरुदेव के साथ थे और उस समय हमने देखा, सरकार ने राजा को उनकी सेवा के लिए नहीं बुलाने का निर्णय किया था। जगन्नाथ को उठाने और रथ पर लाने के लिए सभी बहुत प्रयास कर रहे थे किन्तु ठाकुर उठ नहीं रहे । सब परेशान हो गए, क्या करें? सब जगन्नाथ से प्रार्थना करने लगे। प्रभु ने आदेश दिया कि वे राजा को बुलाएँ।जब वह आएंगे तब ही मैं रथ पर चढ़ूंगा। इधर, राजा ने स्वयं को कमरे में बंद कर लिया था और रो रहे है। जब राजा आए और उन्होंने स्वयं झाडू लगाई, तब जगन्नाथ तुरंत रथ पर चढ़ गए। भगवान अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करते हैं|

 

इसी प्रकार जब दारुब्रह्म को मंदिर में लाया गया, राजा इन्द्रदुम्न ने उस दारुब्रह्म से मूर्ति को तराशने के लिए कारीगरों को बुलाया परन्तु जो कारीगर आता है, उनके औजार सब नष्ट हो जाते हैं। तब भगवान स्वयं अनंत रूप से प्रकट हुए और कहा कि मैं दारुब्रम्ह से मूर्ति को प्रकट करूँगा, इसके लिए 21 दिन लगेंगे। और उन 21 दिनों तक कोई उन्हें परेशान न करें। राजा ने उनकी बात स्वीकार कर ली। सात दिनों तक वे बंद कमरे से आवाज़ आती रही, किन्तु उसके बाद आवाज़ आनी बंद हो गयी। ऐसे ही 14 -15 दिन बीत गए किन्तु कमरे से कोई आवाज नहीं आती। इसलिए उन्होंने सोचा कि बढ़ई की मृत्यु हो सकती है क्योंकि वह बहुत बूढ़ा था और उसने इतने दिनों तक कुछ नहीं खाया। ऐसा सोचकर, उन्होंने दरवाजा खोला और उन्हें बलदेव, सुभद्रा और जगन्नाथ के असम्पूर्ण विग्रह दिखाई दिए। राजा यह सोचकर रोने लगे कि उनके कारण ऐसा हुआ है। परन्तु जगन्नाथ ने उनसे कहा, “तूने मेरी इच्छा से ही ऐसा किया है। इस अधूरे रूप में प्रकट होने की मेरी इच्छा है।”

 

एक बार जब माता रोहिणी द्वारिका गई थीं, तो उन्होंने द्वारिका की रानियों से कहा कि तुम सब कितने भाग्यशाली हो कि कृष्ण तुम्हारे पास हैं। वह ब्रज को भूल गया है और तुम्हारे साथ है। यह सुनकर रानियों ने उत्तर दिया कि ऐसा नहीं है कि कृष्ण अभी भी ब्रज में ही हैं, वे यहाँ नहीं हैं, केवल उनका शरीर यहाँ है। रात में, उन्होंने कभी हमारा नाम नहीं लिया, कभी सुबल सखा कभी किसी और गोपी का नाम लेते हैं, उनका हृदय ब्रज में है। ब्रजवासी का उनसे कितना प्रेम है, उन्होंने कभी गलती से भी हमारा नाम नहीं लिया!

 

द्वारिका की रानियों ने माता रोहिणी से कृष्ण और ब्रजवासी के बीच प्रेमपूर्ण आदान-प्रदान के बारे में बताने का अनुरोध किया। माँ रोहिणी ने कहा कि वह कृष्ण और बलराम की अनुपस्थिति में उन लीलाओं को सुना सकती है। उन सभी ने कृष्ण और बलराम को रोकने के लिए सुभद्रा को द्वारपाल के रूप में नियुक्त किया। किन्तु भगवान ने कहा है, ‘यत्र गायन्ति मदभक्त तत्र तिष्ठामि नारद’। और जब माँ रोहिणी कृष्ण के लिए ब्रज-गोपियों के प्रेम की महिमा बता रही थी, वहाँ कृष्ण और बलराम आ गए और कृष्ण, बलराम और सुभद्रा के हाथ और पैर सिकुड़ने लगे। गोपियों के प्रेम से प्रकट इस रूप को देखकर श्री चैतन्य महाप्रभु प्रेम में पागल हो गए और उन्हें गले लगाने के लिए दौड़ पड़े। हम लोग देखते हैं कि उनके हाथ-पैर नहीं है परन्तु इसका कारण है, अब इस तत्त्व को बोल दिया।

 

जगदीश पंडित की महिमा भी सुननी चाहिए। मैं संक्षेप में बोलूंगा। जगदीश पंडित प्रभु पहले प्राग-ज्योतिषपुर में रहते थे, जिसे वर्तमान में आसम में गुवाहाटी के नाम से जाना जाता है। पवित्र नदी गंगा के तट पर रहने और हरिभजन करने की उनकी इच्छा हुई । इसलिए वह अपने छोटे भाई हिरण्य और पत्नी दुःखिनी माता के साथ मायापुर आ गए और अपने घर से लगभग 2 मील दूर जगन्नाथ मिश्र और शची माता के घर के पास रहने लगे। दो परिवारों के बीच एक बहुत ही स्नेहपूर्ण सम्बन्ध विकसित हुआ। जब निमाई का आविर्भाव हुआ तो सबको उन पर बहुत स्नेह आया और दुःखिनी माता ने ममता के कारण उन्हें गोद में उठाकर दूध पिलाया। जगदीश पंडित और दुःखिनी माता निमाई को पुत्रवत स्नेह करते थे। एक बार निमाई ने हरिनाम संकीर्तन में सभी को सम्मिलित करने की लीला की। अपने प्रकट होने के समय भी चंद्र ग्रहण का बहाना लेकर, उन्होंने सभी से हरिनाम करवाया और उसी समय प्रकट हुए। निमाई बहुत सुन्दर है पर बीच -बीच कई बार वे रोने लगते थे और तब तक नहीं रुकते जब तक कि शची माता और अन्य सभी महिलाएं ताली नहीं बजातीं और ‘हरिबोल हरिबोल’ का जाप नहीं करतीं। शची माता यशोदा माता से अभिन्न है।

 

एक दिन एकादशी तिथि में शिशु निमाई रोने लगा तथा उसका रोना रुका नहीं। सभी हरिनाम कीर्तन कर रहे थे किन्तु तब भी शिशु का रोना रुक नहीं रहा था। तब निमाई से पूछा, “तुम्हें क्या हुआ? तुम इतना क्यों रो रहे हो? क्या चाहते हो तुम?” उन्होंने उत्तर दिया, ““आज एकादशी तिथि है तथा श्रीजगदीश पण्डित के घर में आज जो विष्णु नैवैद्य तैयार किया गया है, उसे मैं खाना चाहता हूँ।” तब शची माता तथा जगन्नाथ मिश्र एवं अन्यान्य सभी आश्चर्यचकित हो गए कि आज एकादशी तिथि है, यह इस बालक को कैसे पता चला? एवं एकादशी में श्रीजगदीश पण्डित ने विष्णु के नैवैद्य तैयार किए हैं, यह इसे कैसे पता लगा? तब जगन्नाथ मिश्र जी ने सोचा, “जगदीश पण्डित मेरे मित्र हैं, मैं जाकर उनसे निवेदन करूंगा।” वे तुरंत उनके घर गए तथा कहा,

 

“क्या आपने भगवान विष्णु के लिए नैवैद्य तैयार किया है? अब क्या कहूँ; मेरा पुत्र विष्णु नैवेद्य अर्पण करने से पहले खाना चाहता है। इसलिए वह रो रहा है तथा नैवेद्य लिए बिना चुप नहीं होगा। इससे अपराध होगा। हम उसे नैवेद्य कैसे दे सकते हैं?” तब पण्डित ने कहा, “गोपाल की इच्छा है। यह निमाई नहीं कह रहा, गोपाल ही निमाई के माध्यम से कह रहे हैं। आप सारा नैवेद्य ले जाइए। चिन्ता की कोई बात नहीं है।”

 

इस प्रकार महप्रभु ने एकादशी के दिन बलपूर्वक जगदीश पण्डित की सेवा स्वीकार की। भगवान अपने भक्तों के द्रव्य छीन-छीन कर खाते हैं, किन्तु अभक्त की वस्तु को मुड़कर भी नहीं देखते। कितना प्रेम है उन्हें अपने भक्तों से।

 

जगदीश पण्डित महाप्रभु की इच्छा से पुरुषोत्तम धाम गए तथा जगन्नाथ देव के दर्शन किए। उन्होंने अन्य ब्राह्मणों को साथ लेकर पैदल ही यात्रा की। वहाँ से वापस आने के समय वे बहुत रोने लगे। जगन्नाथ जी के दर्शन करके वापस लौटते समय कितने लोग रोते हैं? वे जगन्नाथ जी को देखकर रो रहे थे तथा उन्हें छोड़कर घर वापस जाना नहीं चाहते थे। वे भगवान के प्रेममय रूप का दर्शन कर रहे थे। गोपियों के प्रेम से निर्मित कृष्ण-बलराम तथा सुभद्रा के रूप को देख रहे थे। जगदीश पण्डित कोई साधारण व्यक्ति नहीं थे, कृष्ण लीला की याज्ञिक ब्राह्मण पत्नी जगदीश पण्डित के रूप में प्रकट हुई थीं। व्रज के रसकोविद चन्द्रहास नर्तक रूप में भी श्रीजगदीश पण्डित प्रभु की पूर्व लीला का परिचय पाया जाता है। वे भगवान के पार्षद हैं। इसलिए उन्होंने देख लिया कि यह साक्षात् मेरे आराध्य हैं तथा उन्हें देखकर रोने लगे। जगन्नाथ ने स्वप्न में कहा, “तुम मुझे ले जाओ।” जगदीश पण्डित ने कहा कि मुझे आपको कौन लेने ले जाने देगा? तब जगन्नाथ जी ने कहा कि नव कलेवर में मेरे पुराने विग्रह को वहाँ एक स्थान पर मिट्टी के नीचे रख देते हैं(समाधि दे देते हैं)। मैं महाराज को वही मूर्ति तुम्हें देने के लिए निर्देश करूँगा।” महाराज को स्वप्न-निर्देश मिला। महाराज विस्मित हो गए तथा जगदीश पण्डित राजा को ढूँढने लगे।

 

जगदीश पण्डित ने पूछा कि आप जो विग्रह देंगे वह तो बहुत भारी है, उसे इतनी दूर कैसे ले जाऊँगा? तब भगवान कहते हैं, “मैं शोला(एक जल का पौधा जिसका तना सुखाने से बहुत हल्का हो जाता है) के समान हल्का हो जाऊँगा। इसलिए विग्रह को नए कपड़े से बाँधकर, एक लाठी में लटकाकर कंधे पर ले जाओ। सब समय कंधे पर रखना। जहाँ रखने की इच्छा हो, वहाँ नीचे रख देना। धरती पर रखने से मैं और आगे नहीं जाऊँगा, यह शर्त है।”

 

तब जगदीश पण्डित जगन्नाथ जी को लेकर मायापुर की ओर जाने लगे। चलते-चलते वे चक्रदह नामक स्थान पर पहुँचे। यह कोई साधारण स्थान नहीं है। यह वहीं स्थान है जहाँ पर महाराज भगीरथ जी के रथ का चक्का भूमि में धँस गया था, जब वे सगर वंश का उद्धार करने के लिए गंगाजी को ले जा रहे थे। साधारण लोग इसे चाकदाह कहते हैं। इसे रथवर्म भी कहते हैं। यहाँ प्रद्युम्न ने शम्भरासुर का वध किया था। इसलिए इसे प्रद्युम्ननगर भी कहते हैं। जब जगदीश पण्डित जी गंगाजी के किनारे पर पहुंचे तो उन्होंने एक ब्राह्मण को जगन्नाथ जी को थोड़ी देर पकड़ने ने लिए कहा तथा गंगा स्नान करने चले गए। जब स्नान करने गए, जगन्नाथ जी भारी हो गए। ब्राह्मण जगन्नाथ जी को और अधिक समय कन्धे पर नहीं रख पाया। इसलिए ब्राह्मण ने उन्हें एक वटवृक्ष के नीचे रख दिया। जगदीश पण्डित वहाँ से घर नहीं गए, वहीं रह गए। वहाँ पर एक मंदिर निर्माण किया। तब कृष्णनगर के राजा तथा स्थानीय भक्तों ने हज़ारों एकड़ ज़मीन दी। वहाँ के लोग धार्मिक थे। यह सुनकर कि पुरुषोत्तम धाम से भगवान जगन्नाथ आए हैं, शोरगुल मच गया। उनकी सेवा होने लगी। किन्तु उनकी वंश परंपरा में ऐसा हुआ कि उनके लिए जीवन-निर्वाह करना मुश्किल हो गया। उन्होंने धीरे-धीरे सारी ज़मीन बेच दी। केवल मेला ग्राउंड रह गया।

 

ऐसी स्थिति हो गयी थी कि जगन्नाथ की वस्त्रादि नित्य सेवा-परिचालना का भी अभाव था। तब वहाँ के विशेष भक्त श्रीसुकृति बन्दोपाध्याय हमारे गुरुजी के पास आए तथा प्रार्थना की कि यह स्थान जगदीश पण्डित का है, इसकी सेवा आप ले लीजिए। गुरुजी ने कहा कि यह तो आप लोगों का ही स्थान है। हम कैसे ले सकते हैं। हम यहाँ पर प्रचार कर देंगे, धन दे देंगे। परन्तु वे बार-बार गुरुजी के पास आकर निवेदन करने लगे। उनके बार-बार निवेदन करने से गुरु जी ने समझा कि जगन्नाथ की सेवा देने की इच्छा है। तब गुरुजी ने वह स्थान ले लिया।

 

इसके पश्चात् उस स्थान का बिल्कुल परिवर्तन हो गया, अच्छा हो गया। पहले कुछ भी नहीं था, वहाँ मंदिर भी नहीं था। मंदिर हो गया, नाट मंदिर हो गया, स्नान वेदी हो गई। प्रत्येक वर्ष वहाँ स्नान यात्रा होती है। इस बार वहाँ जाना नहीं हो पाया, हम लोग यहाँ से ही स्थान को स्मरण करके दण्डवत् प्रणाम करते हुए कृपा प्रार्थना करते हैं। उस स्थान पर गौर नित्यानंद दो बार आए। जगदीश पण्डित गौरांग को पुत्र की तरह स्नेह करते थे। नित्यानंद बलदेव के विशेष प्रकाश है। नित्यानन्द तथा बलराम अभेद हैं,—‘बलराम हइल निताई’। गौर नित्यानंद दोनों पर ही जगदीश पण्डित बहुत श्रद्धा करते थे। दोनों ने वहाँ आकर नृत्य-संकीर्तन किया। जब वे जाने लगे तो जगदीश पण्डित तथा दुःखिनी देवी रोने लगे, कहते कि हम विरह सहन नहीं कर सकते। बहुत रोने लगे। तब महाप्रभु ने कहा कि मैं गौर-गोपाल रूप से यहाँ रहूँगा। वहाँ पर गौर-गोपाल मूर्ति है। कालना के भगवान दास बाबाजी की भजन कुटीर भी है। बहुत पवित्र स्थान है। पुरुषोत्तम धाम का अभिन्न स्वरूप है।

 

आज मुकुन्द दत्त ठाकुर की तिरोभाव तिथि भी है। श्री मुकुन्द दत्त ठाकुर चट्टग्राम ज़िले के पाटिया थाने के अन्तर्गत छनहरा ग्राम में रहते थे। बाद में वे वहाँ से नवद्वीप में आ गए तथा आकर चैतन्य महाप्रभु के साथ इकट्ठे ही गंगादास पण्डित से अध्ययन करते थे। नवद्वीप परिक्रमा करते समय हम उस स्थान के दर्शन करते हैं। महाप्रभु पहले प्रश्न करते, फिर उत्तर देते, फिर उस उत्तर का खण्डन करते तथा पुनः उसका स्थापन करते। सभी सहपाठी निमाई से भयभीत होकर रहते थे। मुकुन्द व्याकरण के पण्डित थे। एक बार उन्होंने महाप्रभु को अलंकार-शास्त्र के कठिन-कठिन प्रश्न पूछे। महाप्रभु ने सभी प्रश्नों का यथायथ उत्तर दिया। उनके उत्तर सुनकर मुकुन्द दत्त आश्चर्यचकित हो गए तथा सोचने लगे कि इतना ज्ञान तो साधारण व्यक्ति का नहीं हो सकता। यदि यह भक्त होता तो अच्छा होता। एक दिन महाप्रभु हँसते हुए कहने लगे—“एक दिन मैं इस प्रकार वैष्णव बन जाऊंगा बाद में, तुम सब लोग देखोगे।”

 

जब महाप्रभु गया से वापस आए, तो उनमें प्रेम विकार आ गया। मुकुन्द दत्त कृष्ण लीला में मधुकण्ठ हैं। इसलिए जब महाप्रभु प्रेमावस्था में विरह से रोते तो मुकुन्द विरह के अनुरूप गान करके उन्हें सुख देते। यहाँ तक कि अद्वैताचार्य जी, ईश्वर पुरीपाद जी इत्यादि भक्त भी आनंदित हो जाते।

 

श्रीमुकुन्ददत्त ने मुख्य रूप से दो शिक्षाएँ प्रदान की थीं। पुण्डरीक विद्यानिधि जो कि चट्ट्ग्राम वासी थे, नवद्वीप आकर रहने लगे थे। पुण्डरीक विद्यानिधि व्रजलीला में वृषभानु महाराज, राधारानी के पिता हैं। वे स्वयं को छिपाकर रखने के लिए परम भोगी की लीला का अभिनय करने लगे। मुकुन्द दत्त जानते हैं कि वे बहुत बड़े भक्त हैं। एक दिन महाप्रभु “पुण्डरीक रे! बाप रे! बन्धु रे!” कहकर क्रन्दन करने लगे। सभी सोचने लगे कि पुण्डरीक कौन है? तब महाप्रभु ने कहा कि तुम लोग बाद में समझोगे।

 

एक बार मुकुन्द दत्त श्रील गदाधर पण्डित को पुण्डरीक विद्यानिधि जी के दर्शन कराने के लिए ले गए। उनका भोग विलास देखकर गदाधर, जो कि एक निष्ठावान आजन्म ब्रह्मचारी थे, की श्रद्धा थोड़ी कम हो गई तथा वे सोचने लगे कि ये कैसे साधु हैं?

 

तब मुकुन्द दत्त ने एक श्लोक का उच्चारण किया—

 

अहो बकी यं स्तनकालकूटं

जिघांसयापाययदप्यसाध्वी ।

लेभे गतिं धात्र्युचितां ततोऽन्यं

कं वा दयालुं शरणं व्रजेम॥

(श्रीमद्भागवत 3.2.23)

 

अर्थात् जो पूतना अपने स्तनों में कालकूट विष लगाकर कृष्ण को मारने के उद्देश्य से आई थी, उसने थोड़ा मातृभाव दिखाया था, इसलिए उसे धात्र्युचित गति प्रदान की। इस प्रकार दयालु कृष्ण को छोड़कर मैं अन्य किसके शरणापन्न होऊंगा?

 

यह श्लोक सुनकर पुण्डरीक विद्यानिधि सहसा मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़े। कहाँ बिस्तर, कहाँ कपडे उन्हें कुछ पता नहीं, उनमें अष्टसात्त्विक विकार प्रकट होने लगे। उन विकारों को देखकर गदाधर पंडित सोचने लगे कि मेरा तो अपराध हो गया। मैं तो समझा ही नहीं कि ये कौन हैं? कुछ समय बाद महाप्रभु की आज्ञा से उन्होंने उनसे दीक्षा ले ली।

 

उनके जीवन में एक और महत्वपूर्ण घटना है। भगवान अपने भक्तों के माध्यम से शिक्षा देते हैं। मुकुंद की महाप्रभु के प्रति इतनी गाढ़ी प्रीति थी कि जब उन्होंने संन्यास लिया तो मुकुंद को बहुत दुःख हुआ। महाप्रभु दिन में तीन बार स्नान करते थे। उनसे यह सहन नहीं होता था। महाप्रभु ने 21 घण्टे तक अपनी महाप्रकाश लीला का प्रदर्शन किया तथा अत्यन्त स्नेहाविष्ट होकर भक्तों को बुला-बुलाकर उनकी इच्छा के अनुकूल रूप प्रदर्शन किया व उन्हें वर प्रदान किए। किन्तु जो मुकुन्द इतना सुन्दर गान करके सबको सुख प्रदान करते हैं, उन्हें यह अवसर क्यों नहीं दिया?—सभी भक्त इस प्रकार सोचने लगे। श्रीवास पंडित ने जब महाप्रभु से मुकुंद पर कृपा करने का अनुरोध किया, तो महाप्रभु ने कहा—“मुकुंद खड़जाटिया बेटा है। उसकी मति स्थिर नहीं है। जो भक्त मेरे स्वरूप को मानते हैं, उनके साथ मिलकर, दाँत में तिनका लेकर बहुत दीनता दिखाता है, एवं जो लोग मेरे स्वरूप को नहीं मानते उनके साथ मिलकर मेरे अंगों पर प्रहार करता है। सुविधावादी है, इसलिए वह मेरे दर्शनों का अधिकारी नहीं है।”

 

महाप्रभु के कठोर वचनों को सुनकर, मुकुंद ने देह त्याग करने का संकल्प लिया। किन्तु देह त्यागने से पहले उन्होंने श्रीवास पंडित के माध्यम से महाप्रभु के पास एक प्रश्न भिजवाया कि क्या उन्हें भी कभी दर्शन होंगे?

 

महाप्रभु ने उत्तर दिया, “एक करोड़ जन्म के बाद दर्शन दूँगा।”

 

“करोड़ जन्म के बाद दर्शन देंगे”, “करोड़ जन्म के बाद दर्शन देंगे”, “महाप्रभु का वचन कभी झूठा नहीं होगा”, इस प्रकार बोलते-बोलते जब मुकुंद आनंद में विभोर होकर नृत्य करने लगे तो महाप्रभु ने कहा—“हो गया, हो गया। आओ, दर्शन कर लो।” इस प्रकार शिक्षा दी कि भगवान और भक्त के वचनों पर विश्वास होने से सब हो जाता है।

 

मुकुन्द की अभक्तों के कीर्तन में कोई रुचि नहीं थी। अपितु भगवान अपने भक्तों के माध्यम से शिक्षा देते हैं। जिस प्रकार घर में नई वधू आने पर सास अपनी बेटी को डांटकर वधू को शिक्षा देती है। इस प्रकार भगवान अपने भक्तों पर शासन करके संसार को शिक्षा प्रदान करते हैं।

 

महाप्रभु का श्रीधर पंडित से झगड़ा होता था। श्रीधर पंडित कृष्ण लीला में द्वादश गोपालों में अन्यतम हैं। जब श्रीकृष्ण गोचारण के लिए जाते हैं तो उनकी सखाओं के साथ नाना प्रकार की लीलाएँ होती हैं—कभी कृष्ण के साथ खेलते हैं, कभी लड़ते हैं, कभी कन्धे पर चढ़ते हैं। फिर थक जाते है तो सेवा करते हैं, हवा करते हैं, चरण दबाते हैं बहुत प्रेम है सबका| उनमें से एक हैं श्रीधर पंडित। उन्होंने महाप्रभु की लीलाओं में एक गरीब ब्राह्मण की लीला की, जिन्होंने अपने केले के बगीचे के फल,फूल को बेचकर अपना जीवन यापन किया। श्रीधर केले के फूल और थोर (केले के पेड़ के भीतर का डंडा जिससे बंगाल में सब्जी बनती है) को बेचकर अपना जीवन यापन करते हैं। वे इस तरह से जो भी थोड़ा पैसा कमाते थे उसका आधा हिस्सा गंगापूजा पर खर्च करते थे, दूसरा आधा अपनी आवश्यकताओं पर खर्च करते थे। युधिष्ठिर की तरह, वे महा-सत्यवादी थे और सदैव अपने द्वारा बेची गई वस्तुओं की वास्तविक कीमत बताते थे। नवद्वीप में हर कोई यह जानता था और इसलिए उनके साथ सौदेबाजी नहीं करेगा। किन्तु महाप्रभु श्रीधर के पास आकर श्रीधर के बताए मूल्य का आधा देकर उनसे थोर, केला, मोचा ले जाने के लिए खीचातानी,करके प्रतिदिन चार दंड (डेढ़ घंटा) उनसे झगडा करते। प्रतिदिन वे एक-डेढ़ घंटे तक बहस करते थे; तब अंत में महाप्रभु मांगे गए मूल्य का केवल आधा छोड़कर द्रव्य लेकर चले जाते। उनके कलह में भी आनंद है। बाहरिक रूप से झगडा लगता है किन्तु महाप्रभु की सौम्य मूर्ति का दर्शन करके वे आनंद प्राप्त करते थे। अंत में श्रीधर बोलते आप जह्ग्दा करते हैं, मैं बिना मूल्य ही आपको द्रव्य दे दूंगा’श्रीधर सदैव सत्य बोलते थे और प्रत्येक वस्तु की वास्तविक कीमत लेते थे, किन्तु भगवान फिर भी उनके द्वारा मांगी गई राशि का आधा ही देते और फिर ले लेते। श्रीधर उछल कर उस वस्तु को पकड़ लेते, उसे वापस लेने का प्रयास करते, यहाँ तक कि भगवान को धक्का देते। महाप्रभु बोलते तुम प्रतिदिन गंगापुजा के लिए आधा पैसा खर्च करते हो, गंगा का पति तो मैं हूँ, उसको पैसा देते हो, मझे नहीं दोगे? श्रीधर बोलते ठीक है जैसा आप चाहे आपको दे देंगे।

 

जिस दिन महाप्रभु ने चांद काजी के उद्धार की लीला के बाद को छुड़ाया श्रीधर पंडित के घर तक संकीर्तन और नृत्य करते करते श्रीधर आँगन में पहुंचे। महाप्रभु ने पानी पिने कि इच्छा प्रकट की। श्रीधर तो गरीब थे उनके पास लोहे का एक पुराना टूटा हुआ पात्र था। महाप्रभु ने स्वयं श्रीधर के घर में जल से भरे पुराने लोहे के बर्तन को उठाकर परम तृप्ति के साथ पानी पिया। जब श्रीधर ने महाप्रभु को ऐसा करते देखा तो वे जोर-जोर से रोने लगे और बेहोश हो गए।

 

भक्त का पानी पीकर भक्ति प्राप्त कर सकते हैं-महाप्रभु जी ने आचरण करके शिक्षा दी।वे दिखाना चाहते थे कि एक भक्त के पुराने लोहे के बर्तन का पानी भी भगवान के निकट अमृत के समान व् परम आदरर्णीय होता है। इतनी दुकाने हैं किन्तु प्रभु श्रीधर के पास जाकर उनसे झगड़ा कर द्रव्य खरीदते थे,

 

भक्तेर द्रव्य प्रभु काड़ि-काड़ि खाय ।

अभक्तेर द्रव्य पाने उलटि ना चाय ॥

 

विदुर और विदुर पत्नी से छिनकर खाया किन्तु दुर्योधन के द्रव्य स्वीकार ही नहीं किए। भगवान् केवल भक्त का द्रव्य स्वीकार करते हैं। श्रीधर अपने घर में सारी रात जाग कर उच्च स्वर में हरिनाम करते थे, जिससे भक्त तो सुखी होते थे परन्तु अभक्त नींद में व्यवधान पहुँचने पर नाना प्रकार के कटु-वाक्यों द्वारा उनकी भर्त्सना करते। संकीर्तन ही एकमात्र उपाय है, चेतो-दर्पण मार्जनम्..महाप्रभु की शिक्षा है। संकीर्तन से सब कुछ प्राप्त हो जाएगा।

 

महाप्रभु ने महाप्रकाश लीला के समय श्रीधर को अपना ऐश्वर्य रूप दिखाने के लिए बुलाया, जब वे श्रीवास आंगन पहुंचे, तो वे महाप्रभु जी की अपूर्व ऐश्वर्य मूर्ति के दर्शन करके बेहोश होकर भूमि पर गिर पड़े। महाप्रभु ने उन्हें अष्टसिद्धि रूप वर देना चाहते थे, परन्तु श्रीधर ने कहा, “जो प्रभु प्रतिदिन मेरे साथ कलह करते थे, जो मेरे द्रव्य खींचातानी करके मुझसे छिनकर ले जाते थे, जिन्होंने मुझे इसप्रकार सेवा का अवसर दिया, वही प्रभु जन्म-जन्म के लिए मेरे स्वामी बन जाए और उनके पाद्पदम की सेवा प्रदान करें।