साधुसंग से दूर अवस्थित व्यक्ति का मंगलोपाय

श्रीचैतन्य मठ, मायापुर,
22 दिसम्बर, 1927

स्नेहविग्रहेषु

आपका एक पत्र, ** से कल मैंने प्राप्त किया है। इसके पूर्व बहुत दिन पहले और एक पत्र प्राप्त किया था, पश्चिम भारत भ्रमण के पहले। अलग-अलग स्थानों में भ्रमण करते रहने के कारण उस पत्र का उत्तर यथासमय दे न पाया। पश्चिम भारत के विभिन्न स्थानों में उत्सवों की बात शायद आपने ‘गौड़ीय’ (पत्रिका) में या भक्तों के मुख से जानी होगी। सर्वत्र ही श्रीमन् महाप्रभु की वाणी का श्रवण कर सज्जन व्यक्ति मात्र ही आनन्दित हुए हैं।

श्रीनवद्वीप धाम भगवद् भक्तों का परम आदरणीय स्थान है। इस धाम में सर्वत्र ही भगवद् स्मृति का उदय होता है। उसके लिए विशेष इच्छा होती है कि यहाँ और कुछ दिन वास करूँ। अन्य स्थानों पर हरिसेवा करने के लिए आवश्यकता पड़ने पर कलकत्ता आदि स्थानों में जाना पड़ता है। श्रीमन् महाप्रभु परम दयामय हैं; इसलिए उन्होंने कलकत्ता जैसे स्थानों में बहुत भक्तों को रखा है। श्रीगौड़ीय मठ में सर्वदा ही हरिकथा होती है और सभी ही हरिसेवा में प्रमत्त हैं। उनके संग में मेरा शेष जीवन श्रीपरीक्षित राजा की तरह भागवत श्रवण में व्यतीत हो जाये, मेरे लिए परम वरणीय वस्तु है। जहाँ हरिकथा की चर्चा न हो, वहाँ सभी बन्धु – बान्धवों द्वारा घिरे होने पर भी या वहाँ वास करने में जितनी भी सुविधा क्यों न हो, मेरे अन्तिम समय तक मुझे उन सभी स्थानों की या ऐसे जनसंग की बिलकुल आवश्यकता नहीं है।

भगवान् की अपार कृपा से सब जगह मठों में भगवत् – सेवा प्रवृत्ति देखकर महाप्रभु की परम करुणा की अनुभूति होती है। कहाँ विषय रस को उपादेय (उत्तम) मानकर जीवन बिता रहा था ! उस संग के बदले में आज मेरे नाना गन्तव्य स्थानों में श्रीभगवत् – सेवा और भक्तों का संग प्राप्त हो रहा है। इस प्रकार जीवन के बाकी दिनों को बिताने पर हमें हरिवमुिख होकर क्लेशमय जीवन व्यतीत करना नहीं पड़ेगा।

आप ** भगवत् सेवापरायण हरिभजन – उन्मुख व्यक्तियों के निकट अधिक हरिकथा सुन नहीं पर रही हैं, इसलिए आप अपने भाग्य की प्रशंसा नहीं कर रही हैं। किन्तु आपकी नैरन्तर्यमयी हरिसेवा-प्रवृत्ति ने आपको दूसरे संग से दूर रख दिया है। सर्वदा ‘गौड़ीय’ एवं भक्तों के ग्रन्थादि का स्वयं ही पाठ करेंगे। ऐसा करने पर भक्तों के मुख से हरिकथा सुनने का फल प्राप्त होगा।

यद्यपि इस पृथ्वी में अप्राकृत राज्य के बहुत भक्तों से साक्षात्कार नहीं हो पाता, तथापि श्रीमन् महाप्रभु के समय के भक्तों की वार्ता और लीलाकथा, ग्रन्थ और शब्द रूप से नित्य विराजमान हैं। अतएव जागतिक क्लेश की हमें अनुभूति बहुत कम होती है। हम यदि अप्राकृत राज्य की कथा चर्चा करते हुए यहाँ वास करें, तो ऐसी स्मृति हमें जागतिक कष्ट से दूर रखती है।

जहाँ भी रहें, भगवत्-कथा आपको छोड़ कहीं न जायेगी। सांसारिक सभी बातों में ही भगवान् की स्मृति और भगवद् भक्ति की बात जान सकेंगे। भगवान् की इच्छा होने पर पुनः यहाँ लौट आने का सुयोग उपस्थित होगा। भगवान् भक्तों को जिस अवस्था में रखकर सुखी होते हैं, उसी अवस्था में ही वास कर अपने दुःख-क्लेश आदि को भूल जाना उचित है।

भगवान् की कथा, श्रीमन् महाप्रभु की कथा, भक्तों का अलौकिक चरित्र साधारण संसारिक लोग समझ नहीं सकते। हृदय में भगवान् की सेवा- प्रवृत्ति उन्मेषित (जागरित) होने पर सभी अवस्थाओं में ही हरि का स्मरण होता रहता है। आप पारत्रिक (पारमार्थिक) मंगल के लिए चेष्टा कर रही हैं, अतएव ग्रन्थ रूप से भगवान् अपनी सब कथाएँ आपके हृदय में प्रकाशित कर रहे हैं। श्रीचैतन्य भागवत में कहा गया है-

‘जेत देख वैष्णवेर व्यवहार दुःख।
निश्चय जानिह सेइ परानन्द दुःख ।।’

हमारी परीक्षा के लिए सर्वदा ही भगवान् जगत आड़ में अवस्थान कर रहे हैं। प्रत्येक वस्तु की दूसरी ओर उनका आविर्भाव लक्ष्य करने से ही हमारी तात्कालिक प्रतीति कम होती है ।

‘अद्यापि सेइ लीला करे गौरराय।
कोन कोन भाग्यवान देखिबारे पाय ।।’

हमारा ऐसा भाग्य कब होगा, जब हम सर्वत्र श्रीगौरसुन्दर का अनुगमन करते हुए उनके अनुसरण में नियुक्त होकर भक्तिपथ के यात्री होंगे।

भगवान की परीक्षा का स्थान यह पृथ्वी या संसार है। इस परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए हरिजनों का ( भक्तों का) कीर्त्तन सुनना होगा। उस कीर्त्तन को ग्रन्थ के द्वारा आप सुन रही हैं। अतएव आपका सवयं को अभावग्रस्त समझना अनुचित है।

हरण्यकशिपु ने किसी समय इस भूमण्डल में भगवान् ही नहीं हैं ऐसा स्थिर किया था और प्रहलाद को नाना प्रकार की विरुद्ध युक्तियाँ दिखाई थी और उनको मारने के लिए कोशिशें की थी। किन्तु श्रीनृसिंहदेव ने स्तम्भ के भीतर से प्रकट होकर हिरण्यकशिपु एवं सारे जगत का मंगल किया था। भगवद्-भक्त सर्वत्र ही भगवद् दर्शन करते हैं, और भगवद् विद्वेषी सर्वत्र ही भगवान् का अस्तित्व तक अनुभव नहीं कर पाते।

मध्यवर्ती स्थान में रहकर हम लोग कभी हरिसेवा मे रुचि दिखलाते हैं तो कभी दूसरे ही क्षण विषय भोगों में व्यस्त हो पड़ते हैं। हरिसेवा में प्रवृत्त होने इच्छा होने पर ही हमारी विषयभोग-वासना निवृत्त हो जाती है। विषय में तात्कालिक सुख और दुःख वर्तमान है; हरिसेवा में नित्य-भक्ति भगवान् को आनन्द प्रदान करती है। हम लोग उस आनन्द के उद्देश्य से सर्वदा सेवा परायण रह सकते हैं।

इस विस्तृत पत्र को पाठ कर आपको कुछ तात्कालिक उपकार होगा कि न होगा, नहीं जानता। मैं, भाषा-ज्ञान में नितान्त अप्रवीण हूँ, सभी को सब बातें कहकर समझाने का सामर्थ्य न होने के कारण कई बार चुपचाप बैठा रहता हूँ।

इति नित्याशीर्वादक
श्रीसिद्धान्त सरस्वती