श्री गौर पार्षद

श्री देवानन्द पण्डित

अनर्थयुक्त बद्ध जीव विष्णु-वैष्णव की अप्राकृत महिमा को स्पर्श भी नहीं कर सकता है। महिमा कीर्तन करने की चेष्टा करने पर भी उसके द्वारा अमहिमा ही कीर्तित हो जाती है। तथापि अपनी अयोग्यता को समझने के साथ-साथ दीन भाव से कृपा-प्रार्थना के द्वारा कीर्तित होने पर निःश्रेयसार्थी (निश्चित मंगल-प्रार्थी) के दोष-त्रुटि वैष्णवगण क्षमा कर देते हैं। वैष्णवों की प्रसन्न दृष्टि जीव को अनर्थ से उद्धार करके सब प्रकार से मंगल प्रदान करती है। ये ठीक है कि अनर्थयुक्त साधक, विष्णु-वैष्णव की महिमा भली भाँति कीर्तन करने में असमर्थ होते हैं परन्तु असमर्थ होने पर भी विष्णु-वैष्णव के महिमा कीर्तन किये बिना उनके अनर्थ भी खत्म नहीं होते हैं। निष्कपटभाव से उनकी सेवा के लिये यत्न करने पर उनकी कृपा एवं आशीर्वाद से तमाम विघ्न दूरीभूत हो जाते हैं तथा सर्वाभीष्ट लाभ होता है। जगत में शुद्ध-भक्त अति दुर्लभ हैं, बहुत सौभाग्यफल से ही उनका दर्शन और संग प्राप्त होता है

‘गुरु-वैष्णव-भगवान्-तिनेर स्मरण।
तिनेर स्मरण हय विघ्नविनाशन।
अनायासे हय निज वांछित पूरण ।’
-श्रीचैतन्यचरितामृत

‘वैष्णवेर कृपा याहे सर्वसिद्धि।’
-श्रीचैतन्यचरितामृत

‘वैष्णवेर गुणगान, कारिले जीवेर त्राण,
 शुनियाछि साधु-गुरुमुखे।’
-श्रीचैतन्यचरितामृत

 

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