Harikatha

भगवद्-कृपा प्राप्ति का उपाय: शुद्ध-भक्त का आनुगत्य’

भगवान् अस्मोध्..र्व तत्त्व हैं इसलिये उन्हें कोई भी अपनी योग्यता के बल पर नहीं जान सकता। यदि ऐसा माना जाये कि किसी ने अपनी योग्यता के बल पर भगवान् को प्राप्त कर लिया है तो इससे भगवान् की भगवत्ता, सर्वशक्तिमत्ता व उनका असीमत्त्व नहीं रहता। भगवान् की इच्छा ही भगवान् को प्राप्त करने का एकमात्र उपाय है और भगवान् की इच्छा का अनुसरण करने का दूसरा नाम प्रीति व भक्ति है। हम यदि भगवान् की इच्छा अर्थात् श्रुति और स्मृतियों के अनुसार चलें तो हमारे लिये यही भगवान् की कृपा प्राप्त करने का उपाय स्वरूप होगा। किन्तु प्रश्न यह है कि भगवान् की प्रीति के अनुकूल शास्त्र का विधान समझ में कैसे आयेगा, इसके उत्तर में कहते हैं कि उसके लिये सत्संग की एवं शुद्ध-भक्त का आनुगत्य करने की आवश्यकता है।

भक्ति दो प्रकार की होती है – वैधी और रागानुगा। श्रीकृष्ण रागानुगा भक्ति के ही वशीभूत हैं। एक भक्त ने कहा है –

‘श्रुतिमपरे स्मृतिमितरे भारतमन्ये भजन्तु भव भीताः।

अह मिह नन्दं वन्दे यस्यालिन्दे परब्रह्म।।’

(चै.च.म. 19/96 पद्यावली 1/126 से उद्धरित)

कई व्यक्ति संसार सागर से भयभीत हो कर श्रुति, कई स्मृति तो कई भयभीत होकर महाभारत का भजन करते हैं। मैं कहता हूँ यदि वे ऐसा करते हैं तो करें किन्तु मैं तो नन्द महाराज की वन्दना करता हूँ जिनके आंगन में परब्रह्म श्रीकृष्ण नाना प्रकार के खेल खेलते हैं।

नन्द महाराज एवं यशोदा माता ने असीम वस्तु को अपने शुद्ध प्रेम द्वारा वशीभूत कर लिया है। यदि ऐसे भक्त के दरवाज़े तक मैं जा सकूँ तो भगवान् के दर्शन तो अपने आप ही हो जायेंगे। दोनों तरफ़ की बात को समझने के लिये हमें सावधानी से चेष्टा करनी होगी। भगवद् भक्त हमेशा भगवान् का सुख चाहते हैं। यदि कोई व्यक्ति भगवान् के सुख की इच्छा करता है तो उसकी इस भावना व क्रिया के फलस्वरूप भक्त उसके गुलाम हो जाते हैं। जबकि दूसरी ओर भगवान् हमेशा अपने भक्तों का सुख चाहते हैं। इसलिये भक्त को प्रेम करने से भगवान् उसके वशीभूत हो जाते हैं और यही कारण है कि भगवद्-भक्त की प्रेमवश सेवा करने वाले व्यक्ति भगवान् की कृपा अति सहजता से प्राप्त कर सकते हैं। अंग्रेज़ी में एक कहावत है कि “If you love me, love my dog.”— भगवान् को प्रेम करना कठिन नहीं है, इस प्रेम में विद्या, ऐश्वर्य, रूप, यौवन आदि की आवश्यकता नहीं है—

जन्मैश्वर्यश्रुत-श्रीभिरेधमानमदः पुमान्।

नैवर्हत्यभिधातुं वै त्वामकि..न्चनगौचरम्।।

(श्रीमद्भा. 1/8/26)

अर्थात् जो व्यक्ति जन्म, ऐश्वर्य, पाण्डित्य और रूप आदि के अभिमान में प्रमत्त  रहते हैं, वे लोग अकिन्चन व्यक्तियों के ग्रहणीय श्रीकृष्ण नाम का कीर्त्तन करने में असमर्थ होते हैं।

दुनियाँदारी के अभिमान यदि हमारे दिल में स्थान बना लें, और यदि हम कनक, कामिनी व प्रतिष्ठा के पीछे भागते रहें तो ऐसे चित्त में भगवान् का आगमन कैसे होगा? बाहर दरवाज़े पर ‘स्वागतम्’ लिखा रहने पर भी अन्दर कूड़ा-कर्कट भरा रहने के कारण बैठने का स्थान न देखकर घर आया हुआ व्यक्ति जैसे वापस चला जाता है, उसी प्रकार बाहर-बाहर से हम भगवान् के स्वागत की बात करें और हृदय में और-और कामनायें भरकर रखें तो ऐसे में यदि भगवान् आ भी जाएँ तो बैठने का स्थान न देखकर वापस चलें जायेंगे।

 

Footnote: वैधी भक्ति : जिस समय बद्ध जीव का कृष्णेतर विषयों में प्रगाढ़ अनुराग होता है, उस समय उसका कृष्ण के प्रति अनुराग न के बराबर होता है। ऐसी दशा में कल्याणकामी जीव केवल शास्त्र की आज्ञा से कृष्ण का भजन करता है। यह भजन ही वैधभजन है।

रागानुगा भक्ति : श्रीदाम-वसुदाम, श्रीनन्द-यशोदा और ललिता-विशाखा आदि व्रजवासियों की श्रीकृष्ण के प्रति रागात्मिका-भक्ति होती है। और उन व्रजवासियों के भावों के अनुगत रहकर जो साधनभक्ति की जाती है, उसे रागानुगा भक्ति कहते हैं। इष्ट वस्तु श्रीनन्दनन्दन के प्रति प्रगाढ़ तृष्णा राग का स्वरूपलक्षण है तथा उनमें गाढ़ी आसक्ति–राग का तटस्थलक्षण है। ऐसी रागमयी भक्ति को रागात्मिका भक्ति कहते हैं।

{“ब्राह्मणानां सहस्त्रेभ्यः सत्रयाजी विशिष्यते।

सत्रयाजिसहस्त्रेभ्यः सर्ववेदान्तपारगः।।”

“सर्ववेदान्तवित्कोट्या विष्णुभक्तो विशिष्यते।

वैष्णवानां सहस्त्रेभ्यः एकन्त्येको विशिष्यते।।”

(भक्ति संदर्भ 177 संख्याधृत गारुड़ वाक्य)

अर्थात् हज़ार ब्राह्मणों की अपेक्षा एक याज्ञिक श्रेष्ठ है, हजार याज्ञिकों की अपेक्षा एक सर्ववेदान्त शास्त्रज्ञ श्रेष्ठ है। एक करोड़ सर्ववेदान्त शास्त्रज्ञों की अपेक्षा एक विष्णु भक्त श्रेष्ठ है। हज़ार वैष्णवों की अपेक्षा एक एकान्तिक (अनन्य) भक्त श्रेष्ठ है।}