Harikatha

मंगल प्राप्ति का एकमात्र उपाय : श्रीहरिसंकीर्त्तन

[सन् 1972 में चंडीगढ़ मठ के वार्षिक उत्सव में श्रीगुरुदेव जी का अभिभाषण]

संकीर्त्तन का अर्थ है सम्यक् कीर्त्तन, सुष्ठु कीर्त्तन अथवा निरापराध कीर्त्तन। इसके अलावा भगवान् के नाम, गुण, लीला, परिकर, धाम- इन सब का कीर्त्तन भी संकीर्त्तन कहलाता है। बहुत से श्रद्धालु व्यक्तियों द्वारा मिलकर उच्च स्वर में होने वाले हरिनाम-कीर्त्तन को भी संकीर्त्तन कहते हैं।

हरिनाम जप से कीर्त्तन श्रेष्ठ है। होठों को हिलाये बिना हरिनाम जप करने से जप करने वाले का मंगल होता है। किन्तु कीर्त्तन से अपना व दूसरे का या यूँ कहें कि दोनों का मंगल होता है। दृष्टान्त स्वरुप कहा जा सकता है कि जो कमाता है, वह अपने भोजन की व्यवस्था करता है, वह अच्छा है किन्तु उसकी अपेक्षा और भी उत्तम है जो कमा कर अपना और अन्य दसों आदमियों के भोजन की व्यवस्था करता है। उच्चकीर्त्तन द्वारा वृक्ष इत्यादि व पशु-पक्षी आदि जंगम प्राणियों का भी मंगल होता है। इसके अलावा जप से तो चित्त विक्षिप्त भी हो सकता है। उच्च संकीर्त्तन में विक्षेप की आशंका नहीं रहती। दरवाज़े खिड़कियाँ बन्द करके जप करने का प्रयत्न करने पर भी पहले हमने जिन-जिन विषयों का संग किया है, उन सब का चिन्तन करेगा। मेरी इच्छा के विरुद्ध भी अनजाने में मेरा चित्त कहीं और चला जायेगा। थोड़ी सी आवाज़ होने पर भी मेरा चित्त भटक जायेगा किन्तु उच्च-संकीर्त्तन में ध्येय वस्तु श्रीहरि में आसानी से चित्त लग सकेगा। इसलिये जप की अपेक्षा उच्च कीर्त्तन में अधिक लाभ है। विशेषतः कलियुग में जब जीव अत्यन्त विषयाविष्ट, कामातुर, व्याधिग्रस्त और बड़ी कम उम्र वाला हो गया है-ऐसे समय में हरिसंकीर्त्तन ही मंगल प्राप्ति के एकमात्र उपाय के रूप में निर्दिष्ट हुआ है :-

कृते यद्ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखैः।
द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्त्तनात्।।
(श्रीमद्भागवत 12/3/52)

सत्ययुग में विष्णु के ध्यान द्वारा, त्रेतायुग में यज्ञ के द्वारा और द्वापर में परिचर्या (सेवा-पूजा) द्वारा जो कुछ प्राप्त होता है, कलियुग में केवल हरिकीर्त्तन द्वारा वह सब प्राप्त किया जा सकता है।

 

ध्यायन् कृते यजन् यज्ञैस्त्रेतायां द्वापरे?अर्चयन्।
यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ संकी?तर्य केशवं।।
(पद्मपुराण उत्तरखण्ड अ. 42, श्लोक 25)

सत्ययुग में ध्यान के द्वारा, त्रेता में यज्ञों का अनुष्ठान करने से तथा द्वापर में परिचर्या के द्वारा जो फल प्राप्त होता है, कलियुग में एकमात्र हरिनाम-कीर्त्तन करने से वही फल प्राप्त हो जाता है।

हरिनाम-संकीर्त्तन हरेक प्रकार से शुभप्रद है। श्रीचैतन्य महाप्रभु जी ने हरिनाम-संकीर्त्तन का प्रवर्त्तन किया है। उच्च-संकीर्त्तन की प्रचुर महिमा शास्त्रों में कीर्तित हुई है। जो हरिनाम-कीर्त्तन में अनिच्छुक या असमर्थ हैं, उच्च स्वर में होने वाले संकीर्त्तन के द्वारा उनके भी कानों में हरिनाम प्रविष्ट होता है। वस्तु का गुण श्रद्धा या अश्रद्धा के ऊपर निर्भर नहीं करता है। कोई जानता हो अथवा न जानता हो, आग में हाथ देने से जैसे उसका हाथ जल ही जाता है, वैसे ही जैसे भी हो जीव के कानों में हरिनाम का प्रवेश होने से उसका मंगल होगा ही।