Harikatha

श्री चैतन्य वाणी का उपदेश: श्रीकृष्ण-नाम-संकीर्त्तन

[‘श्री चैतन्य वाणी’ के चौथे-वर्ष में प्रवेश पर श्रील गुरुदेव द्वारा वन्दना]

श्री चैतन्य वाणी का जिनके कर्ण-कुहरों में प्रवेश हुआ, उनका ही ह्रदय मार्जित हुआ है। श्रीचैतन्य वाणी ने केवल मात्र उनके हृदयों का मार्जन कर पुनः-पुनः जन्म-मृत्यु के हाथों से उनका उद्धार ही नहीं किया बल्कि उन्हें वास्तव मंगल-स्वरुप, श्रीगौर-कृष्ण के सुस्निग्ध कृपा लोक में प्रकाशित कराते हुए, उनके पास स्व-स्वरुप (जीव स्वरुप), माया का स्वरूप तथा श्रीभगवान् का स्वरूप प्रकशित कर, उनके ह्रदय में आनन्द समुद्र-वर्धन व कदम-कदम पर पूर्णामृत का आस्वादन कराते हुए उन्हें उन्नतम, सुनिर्मल आनन्द सागर में निमज्जन का सौभाग्य प्रदान किया है।

इस प्रकार महिमायुक्त भगवद्-वाणी की वन्दना करते हुए, हम आज नववर्ष में आत्म-पवित्रता के लिए प्रयत्नशील होंगे। ‘श्री चैतन्य वाणी’ की जय हो। इसके श्रद्धालु, श्रवण व कीर्तन करने वाले सेवक, इसका आदर करने वाले व इसका अनुमोदन करने वाले भी जययुक्त हों।

‘श्रीचैतन्य वाणी’ ने हमें अपने तुच्छ स्वार्थों के केन्द्रों में न भटकाकर, सर्वकारण-कारण श्रीगोविन्द जी के केन्द्र बनाते हुए जीवन-यापन करने का उपदेश दिया है। प्राणियों की बहुत सी केन्द्रों वाली चेष्टाओं से सु-फल तो होता ही नहीं बल्कि आपसी एकता में भी बाधक है। हाँ, मूल केंद्र के अनुकूल यदि अगणित केन्द्र भी हों तो कोई नुकसान नहीं बल्कि ये तो एकता के बन्धन को दृढ़ ही करेंगे।

‘श्री चैतन्य वाणी’ ने अन्याय, अधर्म, हिंसा तथा कुविचारों का प्रतिरोध करके एकता के प्रयत्नों का ही उपदेश दिया है।  प्रत्येक जीव की सत्ता, चिद्-तत्त्व से निकली है, चिद्-तत्त्व द्वारा ही संरक्षित है तथा चिद्-तत्त्व में ही चिर-संश्रित है। यहाँ तक कि अचित्सत्ता का भी चिद्-तत्त्व ही कारण है। अतएव तमाम चिद् व अचिद् सताएँ जिनके ऊपर सम्पूर्ण रूप से निर्भर हैं, वे ही तमाम कारणों के कारण, मूल चिद्-तत्त्व, भगवान् श्री कृष्ण सभी जीवों के एकमात्र आश्रय-स्वरूप हों-यही जीवों का मंगल करने वाली ‘श्री चैतन्य वाणी’ का हार्दिक अभिप्राय है।

विरूप का अभिमान, दम्भ, दर्प, क्रोध, हिंसा, कपटता आदि सब परस्पर में भेद को उत्पन्न करते हैं तथा आपस में स्वार्थ के टकराव की स्थिति बना देते हैं। भगवद्-दास्य-अभिमान, अहिंसा, सरलता, सुनीचता, सहनशीलता, अमानित्त्व, मानदत्त्व तथा क्षमाशीलता आदि गुण मनुष्यों को आपसी प्रीति-सम्बन्धों की ओर आकृष्ट करते हैं। ‘श्री चैतन्य वाणी’, चिन्मयी-सेवा-भूमिका में परस्पर सभी की मिलन-प्रयासी है। आनन्दमय, विभु व अकारण करुणामय प्रभु की निष्कपट सेवा-वृति ही जीव को श्रीभगवद्-सान्निध्य में ला देती है। अनु-चिद् का विभु-चिद् के साथ, दास का अपने नित्य प्रभु के साथ तथा आनन्द-कण का आनन्द-समुद्र के साथ सुमिलन होता है। आनंद के मिलने पर लेश मात्र भी दुःख नहीं रह पाता। भोग-पर्वृति अन्य-संग कराती है, जबकि त्याग-प्रवृति श्रीभगवद्-मिलन की हमराही बन जाती है।

‘श्री चैतन्य वाणी’ सभी जीवों का सतर्क करते हुए कहती है कि तुम्हारी तमाम सम्पदा, इन्द्रिय, मन, वाक्य व बुद्धि आदि, यदि अखिल रसामृत मूर्ति श्रीकृष्ण में नियोजित नहीं होंगे, तो निश्चित रूप से अशांति ही फैलायेंगे। ‘श्री चैतन्य वाणी’, देशवासियों के द्वार-द्वार पर जाकर उन्हें उनके वास्तविक स्वार्थ को समझाने के लिए उपदेश कर रही है। इसका कहना है कि शुद्ध जीव-सत्ता, स्थूल व सूक्ष्म शरीर की उपाधियों में आसक्त तथा आवृत है। पूर्व संस्कारवशतः, जड़ाभिनिवेश को परित्याग करने में असमर्थ होने से भी, जीव वर्तमान की अवांछित अवस्था में अपने अभीष्ट लाभ के लिए, श्रीकृष्ण-प्रीति के अनुकूल विषयों को स्वीकार करें तथा इसी भावना से ही शरीर व कुटुम्ब का पालन-पोषण करें। ‘श्री चैतन्य वाणी’ भरोसा देते हुए कहती है कि जीव  केवल चरम व पूर्णानन्द की प्राप्ति का ही लक्ष्य रखें तथा आनन्द-प्राप्ति (भगवद्-प्राप्ति) के बाधक, जिन-जिन भोगों को परित्याग करने में उनको असमर्थता प्रतीत हो रही है, उन-उन भोगों को मज़बूरी से, दुःखी मन से व उसकी निन्दा करते हुए उन्हें अंगीकार करते हुए जीवन निर्वाह करते रहने से, जल्दी ही उन अवांछित अवस्थाओं से छुटकारा मिल जाएगा। अवांछित-अनुशीलन के प्रति, किसी भी अवस्था में आत्म-श्लाघा नहीं करनी होगी अर्थात् भगवान् की भक्ति के प्रतिकूल कार्यों को करने में अपना बड़प्पन नहीं मानना चाहिए। निरन्तर श्रीकृष्ण नाम के अनुकूल अनुशीलन के द्वारा अर्थात् श्रीकृष्ण नाम के श्रवण, कीर्तन, स्मरण आदि के द्वारा श्रद्धालु व्यक्ति, धीरे-धीरे श्रीकृष्ण का सान्निध्य प्राप्त करने में सफलता प्राप्त कर लेते हैं।

हम वर्तमान में, परस्पर विरोधी व अति कष्टदायक हिंसा व प्रतिहिंसा से जर्जरित, अशान्त चित्त वाले मनुष्य-समाज के प्रति, दाँतों में तिनका लेकर अर्थात् अत्यन्त दीनता के साथ कातर भाव से ‘श्री चैतन्य वाणी’ का बार-बार श्रवण-कीर्त्तन करने के लिए अनुरोध करते हैं।

‘श्री चैतन्य वाणी’ के संस्पर्श से मनुष्य-समाज, जड़ीय भावों को परित्याग करने में समर्थ हो जाता है। यही नहीं, ‘श्री चैतन्य वाणी’ के संस्पर्श में आकर, मनुष्य  मृत्यु-भय से मुक्त होकर, श्रीहरि की चिद्-लीला आस्वादन का अधिकारी हो सकता है।

‘श्री चैतन्य वाणी’ कृपा करके जीवों के कर्ण-कुहरों अर्थात् कानों में प्रविष्ट होकर, उन्हें तमाम क्लेशों से मुक्त करते हुए प्रेमामृत में आस्वादन का सौभाग्य प्रदान करा कर कृतार्थ करें-यही नववर्ष में इस दास की प्रार्थना है।

{अधोक्षज वस्तु की अप्राकृत इन्द्रियाँ हैं। उन्हीं इन्द्रियों के द्वारा वे अप्राकृत विलास करते हैं। उनका यह विलास नित्य है। उस विलास के ईंधन के रूप में प्रकाशित होना ही प्रत्येक जीव का आत्मधर्म है।}