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श्री नरोत्तम दास जी कहते हैं
युगल किशोर श्री राधा-कृष्ण जी ही मेरे प्राण हैं । जीवन-मरण में मेरी और कोई गति नहीं है । कालिन्दी के तट पर जो केलि कदम्ब का वन है, वहीं रत्नवेदी के ऊपर मैं अपने प्राणस्वरूप श्री राधा-कृष्ण जी को विराजमान करूंगा । श्याम अंगों पर व गौर अंगों पर मैं सुगन्धित चन्दन व चुआ दूंगा तथा उनके श्रीमुख-चन्द्र का दर्शन करते-करते चामर ढुलाऊंगा (मेरा वह दिन कब होगा ?) मालती फूलों की माला Dथ कर दोनों के गले में पहराऊंगा तथा उनके अधरों पर कर्पूरयुक्त ताम्बूल अर्पण करूंगा । श्री ललिता, श्री विशाखा आदि जितनी भी सखियाँ हैं उनकी आज्ञानुसार मैं श्री राधाकृष्ण जी के चरणाविन्द की सेवा करूंगा । श्री नरोत्तम दास जी कहते हैं कि श्री चैतन्य महाप्रभु जी के दासों का दास मैं इस सेवा प्राप्ति की ही अभिलाषा करता हूँ ।

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