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  • सर्वमहागुणगण वैष्णव शरीरे। कृष्ण भक्ते कृष्णर गुण सकल संचारे। सेई सब गुण हय वैष्णव-लक्षण। सब कहा न याय करि दिग्दर्शन।। कृपालु, अकृत-द्रोह, सत्य-सार, सम। निर्दोष, वदान्य, मृदु, शुचि, अकिंचन।। सर्वोपकारक शांत, कृष्णैकशरण। अकाम, निरीह, स्थिर, विजित-षड्गुण। मित्भुक, अप्रमत, मानद, अमानी। गम्भीर, करुण, मैत्र, कवि, दक्ष, मौनी। कृष्ण भक्त के ये तमाम गुण हमें श्रील भक्ति विनोद ठाकुर जी के शुद्धभक्तिमय जीवन में परिपूर्ण रूप से प्रस्फुटित देखने को मिलते हैं। कृपालु, दयानिधि गौरहरि जी ने बद्ध जीवों पर जैसे नौ प्रकार से कृपा वर्षण की हैं, उनके निजजन श्रील भक्ति विनोद ठाकुर महाशय को भी वैसी ही दया को वितरण करते देखा जाता है।
  • श्रीवृन्दावनदास ठाकुर

    “वेदव्यासो य एवासीद्दासो वृन्दावनोऽधुना । सखा य: कुसुमापीड: कार्यतस्तं समाविशत् ।।” श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यास जी ने ‘श्रीमद्भागवत’ में श्रीकृष्णलीला का वर्णन किया है। श्री व्यासाभिन्न विग्रह श्रील वृन्दावनदास ठाकुर जी द्वारा रचित ‘श्रीचैतन्य भागवत’ में श्री चैतन्य लीला वर्णित हुई है। श्री वृन्दावन दास ठाकुर जी के ग्रन्थ का नाम पहले श्री चैतन्य मंगल था। श्री … Continue reading श्रीवृन्दावनदास ठाकुर


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    श्री कृष्ण चैतन्य प्रभु जीवे दया करि

    श्री कृष्ण चैतन्य प्रभु जीवे दया करि’ । स्वपार्षद स्वीय धाम सह अवतरि’ ।। (1) अत्यन्त दुर्लभ प्रेम करिवारे दान । शिखाय शरणागति भकतेर प्राण ।। (2) दैन्य, अत्मानिवेदन, गोप्तृत्वे वरण । ‘अवश्य रक्षिबे कृष्ण-विश्वास,पालन ।। (3) भक्ति-अनुकूल मात्र कार्येर स्वीकार । भक्ति-प्रतिकूल-भाव वर्जन-अंगीकार ।। (4) षडंग शरणागति हइबे याँहार । ताँहार प्रार्थना शुने श्रीनन्दकुमार … Continue reading श्री कृष्ण चैतन्य प्रभु जीवे दया करि


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    साधुसंग से भगवद्-तत्व की उपलब्धि

    [कोलकाता स्थित मठ में श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी के उपलक्ष्य में आयोजित धर्म सभा में श्रील गुरुदेव जी की उपदेशवाणी का सारमर्म] श्रीकृष्ण की आराधना का वैशिष्ट्य समझने के लिये अच्छी तरह से ये जानना आवश्यक है कि श्रीकृष्ण कौन हैं, उनका स्वरूप क्या है? उनके व्यक्तित्व के ऊपर उनकी आराधना का वैशिष्ट्य निर्भर करता है। ‘कृष्ण’ शब्द … Continue reading साधुसंग से भगवद्-तत्व की उपलब्धि


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    क्या आत्मा-परमात्मा को किसी ने देखा है?; मौलवी साहब का सन्देह निस्तारण/भगवद्-दर्शन की योग्यता

    सन् 1947 में श्रील गुरुदेव जी ने ग्वालपाड़ा एवं कामरूप ज़िले के भक्तों के आमन्त्रण पर जिन-जिन स्थानों पर शुभ पदार्पण किया उनमें बिजनी, भाटिपाड़ा, हाउली व बरपेटा इत्यादि स्थान उल्लेखनीय हैं। हाउली में जो धर्म सभा हुई थी उसमे हिन्दू व मुसलमान परिवार के एक हज़ार से अधिक नर-नारी उपस्थित थे। प्रवचन के बीच … Continue reading क्या आत्मा-परमात्मा को किसी ने देखा है?; मौलवी साहब का सन्देह निस्तारण/भगवद्-दर्शन की योग्यता


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    श्रीवास पण्डित

    “पंचतत्त्वात्माकं कृष्णं भक्तरूप स्वरूपकम् । भक्तावतारं भक्ताख्यं नमामि भक्त शक्तिकम् ॥” (श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी के कड़चा से उद्धृत) पंचतत्त्वात्मक श्रीकृष्ण को अर्थात् श्रीकृष्ण के (1) भक्तरूप,(2) भक्त स्वरूप, (3) भक्तावतार, (4) भक्त और (5) भक्त शक्ति को मैं प्रणाम करता हूँ ।     शक्तिमान वस्तु पाँच विभिन्न प्रकार के लीला परिचय से इन पाँच तत्वों … Continue reading श्रीवास पण्डित


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    श्री वक्रेश्वरपण्डित

    श्री कृष्ण लीला में चक्रव्यूह के अन्तर्गत जो  अनिरुद्ध हैं, वे ही गौर लीला में श्री वक्रेश्वरपण्डित के रूप में आविर्भूत हुए। श्री राधिका जी की प्रिय सखी शशि रेखा भी श्री वक्रेश्वरपण्डित के अन्तर्प्रविष्ट हैं। बहुत से लोगों का कहना है कि त्रिवेणी के निकट गुप्तिपाड़ा में ही श्री वक्रेश्वरपण्डित का आविर्भाव स्थान है। … Continue reading श्री वक्रेश्वरपण्डित


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    श्री श्रीधर पंडित

    श्री श्रीधर पंडित श्रीकृष्ण लीला में जो द्वादश गोपालों के अन्यतम कुसुमासव गोपाल थे, वे ही श्री गौर लीला की पुष्टि के लिए श्रीधर पंडित के रूप में आविर्भूत हुए थे― “खोलावेचातया ख्यात: पण्डित: श्रीधरे द्विज:। आसीद् ब्रजे हास्यकरो यो नाम्ना कुसुमासव:॥” (गौ. ग. दी. 133 श्लोक) श्रीधर पंडित नवदीपवासी थे। नौ द्वीपों के समुदाय … Continue reading श्री श्रीधर पंडित


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    श्रील बलदेव विद्याभूषण

    श्रील बलदेव विद्याभूषण प्रभु जी के आविर्भाव के समय और स्थान के सम्बन्ध में निश्चित रूप से कुछ नहीं जाना जाता। ऐतिहासिक लोग महापुरुषों के स्थान, समय के निर्धारण के सम्बन्ध में ध्यान दें तो इन सब विषयों का अभाव दूर हो सकता है। श्रील बलदेव विद्याभूषण प्रभु जी के पावन चरित्र के सम्बन्ध में … Continue reading श्रील बलदेव विद्याभूषण


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    Video Conference


    No Video Conference Scheduled at the Moment!

    श्री नरोत्तम दास जी कहते हैं
    युगल किशोर श्री राधा-कृष्ण जी ही मेरे प्राण हैं । जीवन-मरण में मेरी और कोई गति नहीं है । कालिन्दी के तट पर जो केलि कदम्ब का वन है, वहीं रत्नवेदी के ऊपर मैं अपने प्राणस्वरूप श्री राधा-कृष्ण जी को विराजमान करूंगा । श्याम अंगों पर व गौर अंगों पर मैं सुगन्धित चन्दन व चुआ दूंगा तथा उनके श्रीमुख-चन्द्र का दर्शन करते-करते चामर ढुलाऊंगा (मेरा वह दिन कब होगा ?) मालती फूलों की माला Dथ कर दोनों के गले में पहराऊंगा तथा उनके अधरों पर कर्पूरयुक्त ताम्बूल अर्पण करूंगा । श्री ललिता, श्री विशाखा आदि जितनी भी सखियाँ हैं उनकी आज्ञानुसार मैं श्री राधाकृष्ण जी के चरणाविन्द की सेवा करूंगा । श्री नरोत्तम दास जी कहते हैं कि श्री चैतन्य महाप्रभु जी के दासों का दास मैं इस सेवा प्राप्ति की ही अभिलाषा करता हूँ ।

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