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  • वैष्णव संग, वैष्णव सेवा को छोड़कर जीव में मंगल का और कोई दूसरा रास्ता नहीं है। वैष्णव-सेवा के फल से एवं शास्त्रादि श्रवण के फल से जीवों में भगवान् की महिमा का अनुभव होता है और जीव भगवान् की उपासना में आग्रहान्वित होते हैं।
  • उनकी अपूर्व Adjustment

    लगभग 10-20 वर्ष पहले हुई व्रज  मण्डल परिक्रमा में श्रील गुरु महाराज जी को काम्यवन में श्री गोपाल मन्दिर में न ठहरा कर श्री जगन्नाथ मन्दिर की प्रथम मंजिल के अत्यन्त संकरे से कमरे (मिआनी) में ठहराया गया था। छत बहुत नीचे थी। पंखा भी नहीं था और हवा आने के लिए कोई रास्ता भी … Continue reading उनकी अपूर्व Adjustment


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    जब भगवान् जगन्नाथ जी ने स्वयं युद्ध क्षेत्र में आकर अपने भक्त की प्रतिज्ञा-रक्षा की।

    श्रीमन् महाप्रभु की लीला काल से पूर्व उड़ीसा राज्य के गजपति राजवंश में श्रीपुरुषोत्तम देव नामक एक राजा थे जोकि भगवान श्री जगन्नाथ देव के अनन्य-शरण भक्त थे। जब श्रीपुरुषोत्तम के साथ कांची नगर की राजकुमारी पद्मावती का विवाह निश्चित हुआ तो कांची के राजा वर को मिलने के लिए पुरी आये। जब कांची के … Continue reading जब भगवान् जगन्नाथ जी ने स्वयं युद्ध क्षेत्र में आकर अपने भक्त की प्रतिज्ञा-रक्षा की।


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    अपने दोषों का अनुभव

    जब तक हम अपने भौतिक अहंकार को नहीं छोड़ेंगे, तब तक अपने जागतिक अभिमान एवं अपने दोषों को नष्ट करना हमारे लिए सम्भव नहीं होगा। स्वरूप-भ्रम ही जागतिक अभिमान की वृद्धि, धोखा देने की वृत्ति एवं इसी प्रकार के अन्य दोषों का मूल कारण है। बद्ध जीव के लिए सांसारिक अभिमान को छोड़ना आसान नहीं … Continue reading अपने दोषों का अनुभव


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    योगिनी एकादशी

    आषाढ़ महीने के कृष्ण-पक्ष की ‘योगिनी एकादशी‘ ब्रह्मवैवर्त पुराण में महाराज युधिष्ठिर व श्रीकृष्ण संवाद में लिखा है कि महाराज युधिष्ठिर द्वारा आषाढ़ मास की कृष्ण-पक्षीय योगिनी एकादशी का महात्मय पूछने पर भगवान श्री कृष्ण ने कहा – समस्त पापों का नाश करने वाली यह एकादशी तिथि महापाप विनाशिनी है। यह संसार बंधन से मुक्ति … Continue reading योगिनी एकादशी


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    प्रवृति बनाम निवृति मार्ग

    दो प्रकार के मार्ग हैं – ‘प्रवृतिमार्ग’ वैवाहिक जीवन वाला मार्ग एवं ‘निवृतिमार्ग’ अथवा अविवाहित जीवन वाला अर्थात् त्याग वाला मार्ग। सामान्य लोग ‘प्रवृतिमार्ग’ के लिए योग्य होते हैं। वे लोग ही संन्यासी जीवन को बिताने में समर्थ होते हैं जिन्होंने अपने मन में ये बिठा लिया है कि वे कभी भी वैवाहिक जीवन में … Continue reading प्रवृति बनाम निवृति मार्ग


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    भगवद्-भक्त नित्य है

    भगवान, भगवान के पार्षद एवं भगवद-भक्त जो लीला करते हैं, वह साधारण मनुष्य के समान नहीं होती। मनुष्य का जन्म होता है, मृत्यु होती है। हम संसार में जितने भी प्राणियों को देखते हैं, उन सबका जन्म होता है और फिर मृत्यु भी होती है। किन्तु भगवान इस संसार में आते हैं, भगवान प्रकट होते … Continue reading भगवद्-भक्त नित्य है


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    दुखों के मूल कारण के विषय पर

    दुखों के मूल कारण के विषय पर श्री चैतन्य गौड़ीय मठ के वर्तमान आचार्य श्री श्रीमद भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज जी !   हम बंधन में हैं और हमें तीन प्रकार के ताप सता रहे हैं; इस बात से सिद्ध होता हैं कि हम भगवान श्रीकृष्ण से विमुख हो गए है | हमारे दुखों … Continue reading दुखों के मूल कारण के विषय पर


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    आध्यात्मिक प्रवचन

    आध्यात्मिक प्रवचन वक्ता: परंपूज्यपाद त्रिदंडिस्वामी भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज | स्थल: श्रीराधाकृष्ण मंदिर, गंज बाज़ार, शिमला | दिनांक 7 मई 1994, समय साय 5 बजे | आसाम प्रचार के समय सिलचर मैं मैंने एक दिन प्रवचन किया तो उस दिन सभा के मुख्य अतिथि कोई प्रोफेसर थे | मेरे बोलने के बाद उन्होने भाषण … Continue reading आध्यात्मिक प्रवचन


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    Video Conference


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    वामन, 22 जून सोमवार
    श्रीश्रीजगन्नाथ पुरी धाम में गुण्डिचा मन्दिर मार्जन। प्रातः 7.54 के बाद अम्बुवाची आरम्भ। (इस समय से अम्बुवाची समाप्त होने तक भूमि की खुदाई नहीं करनी चाहिए)।

    वामन, 23 जून मंगलवार
    श्रीश्री जगन्नाथदेव जी की रथयात्रा। श्रीश्रील स्वरूप दामोदर गोस्वामी जी एवं श्रीश्रील शिवानन्द सेन जी का तिरोभाव।

    वामन, 25 जून गुरुवार
    रात्रि 8.18 के बाद अम्बुवाची समाप्त।

    वामन, 1 जुलाई बुधवार
    श्रीश्रीजगन्नाथदेव जी की पुनर्यात्रा। श्रीश्रीरथयात्रा महोत्सव समाप्त। शयन एकादशी-उपवास। (द्वादशी – बुधवार सांय 4.53 से गुरुवार दोपहर 2.44 तक; तुलसी चयन निषेध )

    वामन, 2 जुलाई गुरुवार
    पूर्वाहण (सुबह) 9.27 से पहले पारण। द्वादशी आरम्भ पक्ष से चातुर्मास्य व्रत आरम्भ।

    वामन, 5 जुलाई रविवार
    गुरु पूर्णिमा। श्रील सनातन गोस्वामी प्रभु का तिरोभाव। श्रीश्रील प्रभुपादनुकम्पित श्रीमथुरामोहन दास बाबाजी महाराज का आविर्भाव। पूर्णिमा आरम्भ पक्ष से चातुर्मास्य व्रत आरम्भ।

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